भारत की 5 वीरांगनाओ जिन्होंने अपने बलिदान से लिखी अमरकथा

वीरांगनाओ भारत देश के इतिहास स्वर्णिम रहा है जहाँ हमारे देश को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था। वही इस देश के दामन पर दाग लगाने और इस भूमि पर अपना कब्ज़ा करने के उद्देश्य से ब्रिटिश से लेकर विदेशी लुटेरों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जहाँ उन ताकतवर हमलावरों ने देश के कई राज्यों पर आक्रमण कर उनपर अपनी हुकूमत की, तो देश में कुछ महाराजा-महारानी ऐसे भी थे जिन्होंने उनके शासन के खिलाफ जंग छेड़ दी।

इन विदेशी हमलावरों के खिलाफ आवाज़ उठाने वालो में सिर्फ देश के राजा-महाराजा ही नहीं बल्कि देश की वीरांगनाओ  भी आती थी। जिन्होंने अपने पराक्रम से विदेशी हमलावरों के दांत खट्टे करे, आज हम आपको देश की ऐसे ही वीर रानी-महारानी  के बारे में बताएंगे।

  1. महारानी पद्मावती(Padmavati):

Beautiful Padmavati
वीरांगनाओ में रानी पद्मवनी, राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की पुत्री थीं
  • फिल्म “पद्मावती” से सुर्खियों में आई है रानी पद्मवनी। राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की पुत्री थीं पद्मनी। रानी पद्मावती का विवाह चित्तौड़ के राजा रत्नसिंह के साथ हुआ था। रानी बहुत ही खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती के चर्चे दूर-दूर तक थे।
  • रानी पद्मावती की सुंदरता पर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का दिल आ गया। इसके साथ ही रानी को प्राप्त करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। खिलजी ने राजा रत्नसिंह को धोखे से मार गिराया। तब अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिए वीर रानी पद्मावती ने 1303 ईस्वी में राजपूत वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लिया।

2. रानी दुर्गावती (Durgavati):

Maharani Durgavati
वीरांगनाओ दुर्गावती का जन्म सन1524 में गोंडवाना में हुआ था
  • महारानी दुर्गावती का जन्म सन 1524 में गोंडवाना में हुआ था। कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं दुर्गावती। राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह के साथ उनका विवाह हुआ था। विवाह के सिर्फ 4 साल बाद ही राजा दलपतशाह चल बसे। उस समय रानी दुर्गावती का पुत्र नारायण काफी छोटा था, ऐसे में रानी ने ही गढ़मंडला का कार्यभार संभाला।
  • महारानी दुर्गावती की बहादुरी का वर्णन भारतीय इतिहास में काम ही मिलता है क्योंकी उन्होंने मुस्लिम शासको को कई बार युद्ध में हराया। मुग़ल शासक अकबर(Akbar) दूसरी राजपूत घरानों की विधवाओं की तरह ही महारानी दुर्गावती को भी अपने रनवासे की शोभा बनाना चाहता था।
  • रानी दुर्गावती ने अकबर के आगे झुकने से इंकार करते हुए अपनी आज़ादी और अस्मिता के लिए युद्ध भूमि का रास्ता चुना और युद्ध में अनेक बार शत्रुओं को पराजित करते हुए 1564 में देश के लिए अपना बलिदान दे दिया।

3. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (Jhansi ki Rani Lakshmi Bai):

Rani Lakshni bai
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में हुआ था
  • ‘मनु’ यानि रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 में वाराणसी में हुआ था। उनका नाम मणिकर्णिका था। प्यार से सब उन्हें “मनु” बुलाते थे। 1842 में मनु की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुई। शादी के बाद ही मनु को ‘लक्ष्मीबाई’ नाम से नवाज़ा गया। 1851 में इनको एक बेटा हुआ लेकिन 4 महीने बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।
  • इसके बाद रानी ने दामोदर राव को गोद लिया गया। रानी लक्ष्मीबाई 18 साल की थी जब महाराजा गंगाधर राव की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी, ब्रिटिश हुकूमत ने बालक दामोदर को झांसी का वारिस मानने से इंकार कर दिया और वो झांसी को ब्रितानी राज्य में मिलाने का षड्यंत्र करने लगे।
  • 1858 में ब्रिटिश सरकार ने झांसी पर हमला कर उसको घेर लिया व उस पर कब्जा कर लिया। रानी ने हार नहीं मानी और वो अंग्रेज़ो का सामना करते हुए 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हो गई। वीरांगनाओ में इनका नाम अमर है।

4.रानी द्रौपदी (Draupadi) :

Rani Draupadi
वीरांगनाओ में महारानी द्रौपदीबाई
  • रानी द्रौपदीबाई धार क्षेत्र में हुई क्रांति की सूत्रधार थी। धार के राजा के देहांत के बाद राजा की बड़ी रानी द्रौपदीबाई ने ही राज्यभार को संभाला क्योंकि आनंदराव बाला साहब नाबालिग थे।
  • रानी द्रौपदीबाई ने 1857 की क्रांति में ब्रितानियों का विरोध किया। रानी ने क्रांतिकारियों की सहायता की। ब्रिटिश सैनिकों ने 22 अक्टूबर 1857 को धार का किला घेर लिया। ये किला मैदान से 30 फुट की ऊंचाई पर था। किले के चारों ओर 14 गोल तथा 2 चौकोर बुर्ज बने हुए थे।
  • क्रांतिकारियों ने उनका डटकर मुकाबला किया। ब्रितानियों को आशा थी कि वे शीघ्र आत्मसमर्पण कर देंगे, पर ऐसा न हुआ। 24 से 30 अक्टूबर तक संघर्ष चलता रहा। रानी द्रौपदीबाई ने वीरता के साथ उनका सामना किया।

5.राजकुमारी रत्नावती (Ratnavati) :

Rajkumari Ratnavati of Jasalmer
राजकुमारी रत्नावती
  • जैसलमेर के नरेश महारावल रत्नसिंह ने अपने किले की रक्षा की जिम्मेदारी अपनी बेटी रत्नावती को सौपी थी।इस किले पर कब्ज़ा करने के लिए दिल्ली के शासक अलाउद्दीन की सेना ने किले को घेर लिया,। राजकुमारी रत्नावतीने इससे ना घबराते हुई उनका डटकर सामना किया और अलाउद्दीन क्वे सेनापति सहित 100 सैनिको को बंधक बना लिया अलाउद्दीन के इरादों पर पानी फेरते हुए इस शासक को अपने कदम वापस लेने पर मजबूर आकर दिया।

ये थी भारत भूमि की वो वीरांगनाओजिसने अपने पराक्रम और बहादुरी से अपना नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरों में हमेशा के लिए दर्ज़ करा लिया, इन्ही सभी को हमारा शत-शत नमन है।