दीवाली कहानी, लक्ष्मी पूजन मंत्र और मुहूर्त

दीवाली हिंदुओं के मुख्य त्यौहारों में से एक है. दीपावली को लक्ष्मी पूजा के नाम से भी जाना जाता है. दिवाली लोगो के लिए खुशियों भरा त्यौहार है. इस त्यौहार को पूरे भारत में बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है. इस फेस्टिव सीजन के लिए कार्यालयों में भी छुट्टी दी जाती है. लोग अपने-अपने घरों को जाते हैं और अपने परिवार वालो के साथ इस त्यौहार का भरपूर आनंद लेते हैं.

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दीवाली

दीवाली भगवान श्री राम के अयोध्या वापसी की खुशी में मनाई जाती है. दीवाली के दिन लक्ष्मी जी की पूजा का भी विधान है.
इस साल दीवाली 19 अक्टूबर=2017 यानी बृहस्पतिवार को मनाई जाएगी. शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान राम 14 वर्ष के बाद रावण यानी अंधकार पर विजय प्राप्त कर अयोध्या वापस लौटे थे. प्रभु राम के आने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर भगवान के वापसी का उत्सव मनाया था. स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर सभी देवताओं की पूजा इस विधि विधान के साथ करनी चाहिए.

कुछ ऐसे करे दिवाली पर घर की सजावट

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त:
दिवाली के दिन लक्ष्मी माँ के पूजन का मुहूर्त शाम 07:11 से लेकर रात को 08:16 तक है.

महानिशा काल पूजा का मुहूर्त:
रात 11:40 से लेकर रात को 12:31 तक है

दिवाली पूजा विधि :
दिवाली के दिन पूजन मुहूर्त के समय पूजा घर में लक्ष्मी और गणेश जी की नई मूर्तियों को स्थापित करें.
पूजा की चौकी पर स्वस्तिक बनाकर और चावल रखकर उसके ऊपर कलश की स्थापना करनी चाहिए.
इसके बाद प्रतिमा के सामने बैठकर हाथ में जल लेकर शुद्धि मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे मूर्ति पर, परिवार के सदस्यों पर और घर में सर्वत्र छिड़कना चाहिए.

दिवाली का त्यौहार पाँच दिन (धनतेरस, नरक चतुर्दशी, अमावश्या, कार्तिक सुधा पधमी, यम द्वितीया या भाई दूज) का हिन्दू त्यौहार है. जिसकी शुरुआत धनतेरस (अश्वनी माह के पहले दिन का त्यौहार है) से होती है और भाई दूज (कार्तिक माह के अन्तिम दिन का त्यौहार है) पर खत्म होती है.
इस त्यौहार को लोग खुशी से घरों को सजाकर बहुत सारी Light, दिये, candles  जलाकर, आरती पढकर, Gifts बाटकर, मिठाईयॉ, cards बॉटकर, एस .एम. एस भेजकर, रंगोली बनाकर, खेल खेलकर, मिठाइयां खाकर मानते हैं.

त्यौहार की शुरुआत:
गुरुवार, 19 अक्टूबर, 2017
धनतेरस: मंगलवार, 17 अक्टूबर, 2017
नरक चतुर्दशी (छोटी दीवाली): बुद्धवार, 18 अक्टूबर, 2017
लक्ष्मी पूजा (मुख्य दिवाली): गुरुवार, 19 अक्टूबर, 2017
बाली प्रतिप्रदा या गोवर्धन पूजा: शुक्रवार, 20 अक्टूबर, 2017
भाईदूज: शनिवार, 21 अक्टूबर, 2017

दिवाली पर सुख समृद्धि के विशेष 8 mantra:
दिवाली पर हर कोई महालक्ष्मी को प्रसन्न करने की कोशिश करता है. हम आपको शास्त्रों और पुराणों से एकत्र 8 ऐसे मंत्र के विषय में बताएंगे जो माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए जरुरी होता है.

महालक्ष्मी मंत्र 1
ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये,
धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:

महालक्ष्मी मंत्र 2
ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:

महालक्ष्मी मंत्र 3
पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्

 महालक्ष्मी मंत्र 4
ॐ आं ह्रीं क्रौं श्री श्रिये नम: ममा लक्ष्मी
नाश्य-नाश्य मामृणोत्तीर्ण कुरु-कुरु
सम्पदं वर्धय-वर्धय स्वाहा:

महालक्ष्मी मंत्र 5
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नम:

 महालक्ष्मी मंत्र 6
ॐ ह्रीं श्री क्लीं नम:

महालक्ष्मी मंत्र 7
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नम:

महालक्ष्मी मंत्र 8
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह नम: महालक्ष्म्यै
धरणेंद्र पद्मावती सहिते हूं श्री नम:

sarijankari के सभी प्रिय पाठकों को दिवाली की ढेरों शुभकामनाएं!!!
अपने साथ-साथ अपने आस-पास के वातावरण का भी ख्याल रखें !!
Polution free दिवाली मनाये और स्वस्थ रहे…..

करवा चौथ की पूजन विधि और मुहूर्त

करवा चौथ व्रत सुहागन महिलाएं अपने पति के लिए करती हैं इस दिन वो पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं. साथ ही भगवान से अपने सुखी गृहस्थ जीवन के भी लिए प्रार्थना करती हैं.

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करवा चौथ

इस बार साल 2017 में करवाचौथ का व्रत आठ अक्टूबर(8 October), रविवार को पड़ रहा है.

करवा चौथ के दिन का मुहूर्त(Karwa chauth Ka Muhurt):

करवा चौथ के दिन पूजा का समय शाम 5:55 पर शुरू होगा और शाम 7: 09 पर पूजा करने का महूर्त समाप्त होगा.

चांद देखना जरूरी क्‍यों है (Kab niklega chaand):
इस व्रत के दिन चंद्रमा का उदय शाम आठ बजकर चौदह मिनट पर होगा. इस दिन महिलाएं चंद्रमा को देखे पानी ग्रहण करती हैं. चाँद निकलने के बाद होने के बाद औरतें चाँद को छलनी से  देखती हैं फिर अपने पति का दीदार भी छलनी से ही करती हैं. इसके बाद पति अपनी पत्नियों को पानी पिलाकर उनका व्रत पूरा करते हैं. चाँद को देखे बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है.

करवा चौथ करने की विधि :
Karwa chauth का व्रत केवल शादी-शुदा महिलाओं के लिये ही होता है. महिलाएं अपने सास या फिर माँ से करवा चौथ करने की विधि सीखती हैं. लेकिन अगर आप अपने घर से दूर रहती हैं और यह व्रत करना चाहती हैं, इसकी विधि जाननी चाहती हैं तो हम आपको इस व्रत की विधि विस्तार से बताएंगे तो चलिए जानते हैं क्या है करवा चौथ व्रत की सही विधि.

  • सरगी करने के बाद करवा चौथ का निर्जला व्रत शुरु होता है. व्रत के दिन माता पार्वती, महादेव और गणेश जी का ध्‍यान मन में करती रहें.
  • गेरू और पिसे चावलों के घोल से दिवार पर करवा का चित्र बनाएं. चित्र बनाने की इस कला को करवा धरना कहा जाता है जो कि पुरानी परंपरा है.
  • लकड़ी के सिंहासन पर माता पार्वती को स्थापित करें. और उन्हें लाल रंग की चुनरी पहना कर  सुहाग, श्रृंगार की  सामग्री अर्पित करें और माँ कि स्थापित मूर्ति के आगे जल से भरा कलश रखें.
  • व्रत के दिन माँ गौरी और गणेश के स्‍वरूपों की पूजा करें.

करवा चौथ के दिन इस मंत्र का जाप करें:
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे.

अधिकतर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार पूजा करती हैं. हर क्षेत्र  में अपने रिवाज के हिसाब से पूजा करने का विधान है. इसलिये कथा में भी अंतर पाया जाता है.
व्रत के दिन करवा चौथ की कथा कहनी सुननी चाहिए कथा के बाद आपको अपने घर के सभी वरिष्‍ठ लोगों का चरण स्‍पर्श करना चाहिये.
रात के समय छननी के प्रयोग से चाँद का दर्शन करें फिर पति के पैरों को छूकर उनका आर्शिवाद लें बाद में पति को प्रसाद दे कर बाद में खुद भी प्रसाद ग्रहण करें.

सभी दम्पत्तियों को करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनायें!!

मां सिद्धिदात्री के पूजन से समाप्त होता है नवरात्र

नवरात्र महापर्व के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा और उपासना की जाती है. मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं.

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मां सिद्धिदात्री

ऐसा माना जाता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा पूरे विधि-विधान के साथ करने वाले मनुष्यों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
मां के चार हाथ हैं और मां सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर विराजमान हैं.
मां के दाहिंनी हाथ में चक्र है ऊपर वाले हाथ में गदा है. दूसरे हाथ में कमल का फूल और शंख है. प्राचीन पुराणों में शास्त्रों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और वशित्व नामक आठ सिद्धियां बताई गई हैं.
भक्तों को ये आठों सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की पूजा और उपासना करने से मिल सकती है.
हनुमान चालीसा में भी इन्हीं आठ सिद्धियों का उल्लेख है कि ‘अष्टसिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन्ह जानकी माता’ यहां ऊपर दिए गए आठों सिद्धियों की बात की गयी है.
शास्त्रों के अनुसार स्वयं भगवान शंकर ने भी मां सिद्धिदात्री देवी की कठोर तपस्या कर मां से ये आठ सिद्धियां प्राप्त की थीं.
मां की कृपा से ही खुद सिद्धिदात्री महादेव की आधी देह हो गयीं और भोलेनाथ अर्द्धनारीश्वर कहलाए.
नौवें दिन इनकी पूजा के बाद ही नवरात्र का समापन माना जाता है.
इस दिन ही हिंदू परिवारों में कन्याओं का पूजन किया जाता है.

मां सिद्धदाद्धत्री स्तुति मंत्र:
सिद्धगन्‍धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी

देवी का बीज मंत्र:
ऊॅं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नमः
ऊपर दिए गए श्लोक के अलावा भी मां सिद्धिदात्री की पूजा में दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोकों का प्रयोग किया जा सकता है.

कन्या पूजन :
नवरात्र के नवें दिन नौ कन्याओं को घर में भोजन कराना चाहिए. नव-देवियों में मां सिद्धिदात्री आखिरी हैं. मां की पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.
जिन कन्याओं को आप कन्या भोज करा रहे हैं उन कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर और 10 वर्ष तक होनी चाहिए.
यदि 9 से ज्यादा कन्या आपके घर भोजन करने आ रही हैं तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.

सातवें दिन करें माँ कालरात्रि की उपासना

नवरात्र महापर्व में सातवां दिन मां कालरात्रि का होता है. मां कालरात्रि को विनाश और संहार की देवी माना जाता है. लेकिन मां अपने भक्तो को हमेशा शुभ फल देती है.

नवरात्र के छठे दिन करें माँ कात्यायनी की उपासना

मां कालरात्रि की कथा :
मां कालरात्रि

मां कालरात्रि ने हाहाकारी दुष्ट असुर रक्तबीज के संहार के लिए अपने तेज से मां काली को उत्पन्न किया था.
माँ का रंग काला होने के कारण इनका नाम मां कालरात्रि पड़ा. दुष्ट दानवों शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनो लोको में हाहाकार मचा दिया था.
असुरो की अति से तंग आकर देवगण भगवान शंकर के पास गए उन्होनें मां पार्वती से असुरों का संहार करने को कहा.
मां पार्वती ने भगवती दुर्गा रूप धारण कर शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध कर उन्हें पराजित किया और मौत के घाट उतार दिया लेकिन जैसे ही माँ ने रक्त बीज का वध करने की कोशिश की तभी उसके रक्त से लाखो असुर पैदा हो गये.
इस तरह माँ जब परेशान हुई तो उन्होंने मां काली को उत्पन्न किया.
जब मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार किया तो माँ काली ने रक्तबीज का सारा रक्त पी लिया और इस तरह दुष्ट दानवों का दलन हुआ.
शास्त्रों के अनुसार सप्तमी की रात सिद्धियों की रात होती है. मां भगवती का यह रूप ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाला है.
मां की कृपा से हर बाधा दूर हो जाती है.
माता की कृपा पाने के लिए उन्हें गुड़ का भोग लगाया जाता है ऐसा माना जाता है कि गुड़ मां कालरात्रि को प्रिय हैं.

सप्तमी को करे इस मंत्र का जाप:
श्लोकः या देवी सर्वभूतेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

शास्त्रों में माँ कालरात्रि को त्रिनेत्री भी कहा गया है इनके तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल हैं.
जिनसे बिजली की तरह किरणें निकलती हैं. माँ के खुले बाल बिखरे हुए रहते हैं
इनकी नासिका से श्वास और भयंकर ज्वालाएं निकलती हैं.
माँ कालरात्रि को शास्त्रों में चतुर्भुजी कहा गया है.
इनकी चार भुजाएं हैं दायीं ओर की ऊपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद देती हैं.
देवी कालरात्रि की सवारी गर्दभ (गधे) है, माँ उसपर विराजमान रहती हैं.

शुभ मुहूर्त में करें कलश स्थापना

कलश स्थापना!!! इस बार शारदीय नवरात्र 21 सितंबर से शुरू हो रहे हैं. इस महापर्व को शारदीय नवरात्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अश्विन माह में पड़ता है.

प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की आराधना

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रम्हचारिणी माँ की आराधना

नवरात्रों में सबसे मुख्य काम जो माना जाता है वो है माता की चौकी लगाना और कलश स्थापना. इस शारदीय नवरात्र कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 3 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा.

कलश स्थापना

नवरात्रि के इस महापर्व के दौरान दुर्गा माँ के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. व्रत  के पहले दिन घटस्थापना की जाती है.

इसके बाद भक्त नौ दिनों तक दुर्गा माँ की पूजा अर्चना करते हैं इसके बाद व्रत के अष्टमी और नवमी में कन्या पूजन होता है.

कलश स्थापना कैसे करें:
21 सितंबर को सुबह माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है. पहला दिन माँ शैलपुत्री को अर्पित किया जाता है.
सुबह कलश की स्थापना की जाती है.
कलश के ऊपर स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है किसी भी शुभ कार्य में स्वस्तिक का चिन्ह शुभ माना जाता है.
कलश में जल डालकर आम के पत्तों से उसे सजाते हैं. मौली से उसे बांधते है.
जल में बिना टूटे चावल (अक्षत) डालकर उसके ऊपर नारियल रखते है.

माता की चौकी स्थापना के लिए एक चौकी रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें. लाल रंग शुभ माना जाता है, फिर उस पर माता की मूर्ति स्थापित करें मूर्ति पर फूल और फूलों की माला इत्यादि चढ़ाएं.
कलश की स्थापना करते वक्त ध्यान रखें कि कलश माँ के मूर्ति कि दायी तरफ रखें.

माँ के नौ रूपों के नाम:
माँ के नौ रूपों के नाम
पहली शैलपुत्री कहलावें (Shailputri Mata)
दूसरी ब्रह्मचारिणी मन भावे (Brahmacharini Mata)
तीसरी चंद्रघण्टा शुभनाम (Chandrghanta Mata)
चौथी कुष्मांडा सुखधाम (Kushmanda Mata)
पांचवी देवी स्कन्दा माता (Skanda Mata)
छठी कात्यायनी विख्याता (katyayani Mata)
सातवीं कालरात्रि महामाया (Kaalratri Mata)
आठवीं महागौरी जगजाया (Mahagauri Mata)
नौवीं सिद्धिदात्री जग जाने (Siddhidatri Mata)
नव दुर्गा के नाम बखाने 

अखंड ज्योत का महत्व:
कलश स्थापना

दोस्तों अखंड ज्योत यानी लगातार जलने वाला दीपक, बिना लौ बाधित हुए जलने वाला दीपक. नवरात्रों में अखंड ज्योत का विशेष महत्व होता है.
इसे जलाने से घर में माँ जगत जननी जगदम्बिका की कृपा बनी रहती है. अखंड ज्योत का संकल्प लेने से पहले उसके विषय में कुछ नियम होते हैं और आपको इन नियमों का पालन करना ही होता हैं.
हिन्दू परंम्परा के अनुसार जिस घर में अखंड ज्योत जलती हैं उस घर के लोगों को जमीन पर सोना पड़ता हैं.
यूँ तो भगवान को याद करने के लिए हर समय उचित हैं, लेकिन मुहूर्त पर पूजन-हवन का अपना एक विशेष महत्व होता हैं कोशिश करें कि इस बार माँ की मूर्ति स्थापना और कलश स्थापना एक साथ ही करें.

Happy Navratri to All Readers!!

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रह्मचारिणी माँ की आराधना

ब्रह्मचारिणी !!! माँ दुर्गा के दूसरे स्वरुप यानी की ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा करने से मनुष्य को ज्ञान के साथ वैराग्य की भी प्राप्ति होती है. शास्‍त्रों में मां एक हर रूप की पूजा विधि और कथा का महत्‍व बताया गया है. मां आपके कठिन समय में आपको सम्बल प्रदान करती है. तो आइए जाने माँ के इस रूप के बारे में.

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा को ऐसे करे प्रसन्न, पूजा विधि, मंत्र

ब्रह्मचारिणी  मां का मंत्र:
ब्रह्मचारिणी

माँ ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र:
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा.”

माँ के नाम का अर्थ बहुत ही सीधा है ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली. माँ का यह रूप साहस और दृढ़ संकल्प के लिए माना जाता है. मां इस रूप में दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल धारण कर भक्तों को वरदान देती हैं .

मां ब्रह्मचारिणी की कथा:
माँ शैलपुत्री ने जब राजा हिमवान के घर जन्म लीं तो एक दिन महर्षि ने पार्वती को उनके पूर्व जन्म की कथा कह सुनाई.ऋषि नारद जी की बातों ने पार्वती जी के मन में शंकर जी के प्रति प्रेम भाव भर दिया. माँ पार्वती ने प्रभु शंकर को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की. इस कठिन और अडिग तपस्या के चलते ही इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया. माँ ने हज़ारों वर्ष फल-फूल खाकर अपना जीवन बिताया.

कई दिन तक कठिन उपवास रखे. माँ ने खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप जैसे तमाम मुश्किल कष्ट सहे. माँ पत्तों को खाकर अपना जीवन बिताती. एक दिन माँ ने पत्तों को भी खाना छोड़ दिया इस कारण माँ का नाम अपर्णा पड़ा.
इस अडिग तपस्या के कारण माँ ब्रह्मचारिणी का शरीर क्षीण हो गया. देवता, ऋषि-मुनि अन्य सभी लोगो ने ब्रह्मचारिणी माँ की तपस्या को अभूतपूर्व कृत्य माना और माँ के इस कृत्य की सराहना की और कहा- देवी किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की है. ये आपके द्वारा ही संभव था. आपकी मनोकामना पूरी होगी और भगवान शिव आपको पति रूप में मिलेंगे.
उन्होंने माँ पार्वती से तपस्या छोड़ घर लौट जाने को कहा और कहा आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं. मां ब्रह्मचारिणी ने तमाम दुखों को सहा लेकिन वह अडिग रही एक पल के लिए भी विचलित नहीं हुई. और आखिरकार उन्हें स्वयं महादेव पति के रूप में मिले. जीवन में कठिन संघर्षों में विचलित नहीं होना चाहिए. मां की कृपा से सभी सिद्धि प्राप्त होती है.

प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की आराधना

माँ दुर्गा के नौ रूप होते हैं. माता दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है. ये माँ के नौ स्वरूपों में उनका पहला स्वरुप है.पर्वत के राजा हिमालय के घर माँ ने पुत्री के रूप में जन्म लिया इसी कारण माँ का नाम शैलपुत्री पड़ा.
नवरात्र के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है.

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रह्मचारिणी माँ की आराधना

मां शैलपुत्री – व्रत कथा( shailputri vrat katha):
शैलपुत्री

महाराज प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ करवाया इस यज्ञ में दक्ष ने सारे देवताओं को निमंत्रित किया, लेकिन शंकर जी से विशेष ईष्या होने के कारण दक्षराज ने उन्हें इस यज्ञ में आने के लिए निमंत्रित नहीं किया. जब माता सती को यह बात पता चली कि उनके पिता विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब माँ सती वहाँ जाने के लिए विचार करने लगी. माँ ने अपनी मंशा भोलेबाबा को बताई कुछ सोचने के बाद शंकर जी ने कहा किसी कारणवश प्रजापति दक्ष ने हमे यज्ञ में नहीं बुलाया है.

यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है. देवों के यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, लेकिन हमे जान-बूझकर न्योता नहीं दिया. यज्ञ से सम्बंधित कोई सूचना भी नहीं भेजी है. ऐसे में तुम्हारा यज्ञ में बिन बुलाये जाना किसी तरीके से सही नहीं होगा. लाख समझने के बाद भी माता पारवती नहीं मणि शंकर जी ने उनका मन रखने के लिए उन्हें जाने की आज्ञा दे दी.

सती ने पिता के घर महसूस किया कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है. सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह से उन्हें गले लगाया. बहने सीधे मुँह सती से बात भी नहीं कर रही थी.
सती ने महसूस किया कि वहाँ भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है.महाराज दक्ष ने भगवान् शंकर के प्रति अपमानजनक वचन भी कहे. पति का अपमान देखकर उनका मन क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा वह अपने पति के अपमान को ना सह सकीं.

उन्होंनेअपने शरीर को यज्ञ वेदी में जलाकर भस्म कर दिया. शंकरजी ने क्रोधित होकर अपने गणों को भेज दक्ष का यज्ञ विधांश कर दिया.
माँ का जन्म हिमालय राज के घर हुआ इसलिए माँ ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं. पार्वती, हैमवती भी माँ के ही नाम हैं.

शैलपुत्री की पूजा विधि(Puja vidhi):
मां की तस्वीर को स्थापित करें और उसके नीचें चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें. अक्षत का ढेर बनाकर उस पर कलश रख दें. फिर हाथ में लाल पुष्प लेकर माता शैलपुत्री का ध्यान करें.

ध्यान मंत्र इस प्रकार है:
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:
इस मंत्र का जाप 108 बात करें.
मंत्र की संख्या पूरी हो जाने पर मां से अपनी मनोकामना व्यक्त करें.

माँ का स्रोत पाठ:
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्.

तीसरे दिन करें माँ चंद्रघंटा की पूजा

तीसरी शक्ति “माँ चंद्रघंटा” (Third form of Maa Chandraghanta):

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चंद्रघंटा

चंद्रघंटा माँ की पूजा नवरात्रो के तीसरे दिन की जाती है. माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के रूप का अर्ध चंद्र है. इसी कारण इनको चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है. माता का ये रूप सुखद शांति देने वाला और मनमोहक है. माता का शरीर सोने के समान चमकदार है. माँ के गले में सफेद सुंदर फूलों की माला होती है.
माँ के दस हाथ हैं जोकि सब किसी ना किसी अश्त्र-शस्त्र से सजे हुए हैं.
माता शेर पर सवारी करती है. माता का ये रूप युद्ध के लिए हमेशा तैयार दिखता है.
ऐसा माना जाता है कि माता के घंटे की तेज और भयभीत कर देने वाली ध्वनि से असुर, अत्याचारी राक्षस और दानव सभी डरते हैं.

अगर माँ भगवती की उपासना की जाती है तो आत्मिक शांति और अध्यात्मिक शक्ति मिलती है.

इनकी आराधना सदा फलदायी होती है.

माँ के भक्त इस दिन भक्ति एवम् श्रद्धा पूर्वक पूजा-अर्चना करते है. और माँ अपने बच्चो को सदा चिरायु और सुख-संपत्ति का वरदान देती है.

कहा जाता है कि इस दिन माँ  की उपासना करके महिलाओ को अपने घर पर बुलाकर भोजन कराया जाना चाहिए. और भेट स्वरूप उन्हे मंदिर की घंटी दी जाए तो माँ की कृपा सदा भक्तो पर बनी रहती है.

माँ चंद्रघंटा की पूजा का मंत्र (Mantra of MaaChandraghanta):
पिण्डज प्रवरारूढा चंडकोपास्त्र कैर्युता
प्रसाद तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता!!

भावार्थ:  अर्थात इनके माथे पर घंटे के आकर का अर्ध चंद्र है, इनके शरीर का रंग सोने के समान चमकीला है. इनके दसो हाथो में शस्त्र आदि है. ये सिंह पर सवारी करती है. इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने वाली है. इनके घंटे की भयभीत ध्वनि से दानव दैत्य सभी डरते है.

माँ चंद्रघंटा की आरती(Aarti of MaaChandraghanta):

“नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान!
मस्तक पर है अर्ध चन्द्र, मंद मंद मुस्कान!!
दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खड़ग संग बांद!
घंटे के शब्द से हरती दुष्ट के प्राण !!
सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके स्वर्ण शरीर!
करती विपदा शांति हरे भक्त की पीर!!
मधुर वाणी को बोल कर सब को देती ज्ञान !
जितने देवी देवता सभी करें सम्मान !!
अपने शांत सवभाव से सबका करती ध्यान!
भव सागर में फँसा हूँ मैं, करो मेरा कल्याण!!
नवरात्रों की माँ, कृपा कर दो माँ!
जय माँ चंद्रघंटा, जय माँ चंद्रघंटा!!”

Skill India,भारत कौशल मिशन

भारत कौशल मिशन!!! भारत में कई सरकार आयी और गयी लेकिन आम लोगों की स्थिति जस की तस बनी हुई है.

विश्वकर्मा जयंती क्यों मनाई जाती है

बढ़ती जनसंख्या और कौशल की कमी के कारण युवा बेरोजगार हैं, और गरीबी में जीवन जीने को मजबूर हैं.

भारत कौशल मिशन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत कौशल मिशन की शुरुआत करके भारत के स्किल इंडिया बनाने के अपने विजन पर जोर दिया है. मोदी स्किल इंडिया को गरीबी के विरुद्ध एक जंग मानते हैं और देश का हर युवा उनके इस युद्ध में उनका सिपाही है. प्रधानमंत्री ने भारत कौशल मिशन की शुरुआत करते हुए कहा कि देश को गरीबी से मुक्त करने के लिए उनकी सरकार प्रतिबद्ध है.
देश को विकास के रास्ते पर अग्रसर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुशल भारत कौशल भारत योजना की शुरुआत की है इस योजना के अंतर्गत 2022 तक 40 करोड़ भारतीय लोगों को प्रशिक्षित किया जाएगा.

स्किल इंडिया का मिशन और मुख्य उद्देश्य(Motto of Skill India):
भारत कौशल मिशन

कौशल विकास योजना का मुख्य उद्देश्य भारत के लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित कर उनके  कार्य क्षमता को बढ़ाना है. कौशल विकास योजना से युवा स्किल सीख कर अपना काम शुरू कर सकते हैं. प्रधानमंत्री युवाओं को हमेशा नौकरी सृजन करने की सलाह भी देते हैं.

  • योजना का मुख्य उद्देश्य उन बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को निखारना है जो गरीबी के कारण उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके.
  • प्रयोजित तरीके से गरीबों और गरीब युवाओं को संगठित करके उनके कौशल का विकास करके गरीबी का ख़त्म करना करना है.
  • गरीबों को रोजगार के काबिल बनाकर उनमे आत्मविश्वास भरना.
  • भारत की  65% जनसंख्या 35 वर्ष से कम है को रोजगार से संबंधित चुनौतियों का सामना करने के लिये अवसर प्रदान करना.
  • युवा जिस भी कौशल (जैसे: गाड़ी चलाना, कपड़े सिलना, खाना बनाना, सफाई करना, मकैनिक का काम करना, बाल काटना, आदि) को जानते हैं, उसी कौशल को निखारकर व प्रशिक्षित करके उसके काम को सरकार द्वारा मान्यता प्रदान करना.
  • देश में मौजूद सभी तकनीकी संस्थाओं को बदलती तकनीक के अनुसार गतिशील बनाना.

इस कौशल विकास योजना में नया क्या है?

आपको बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा शुरु की गयी कौशल भारत योजना नयी नही है. इससे पहले U.P.A सरकार ने भी Skill development योजना को शुरु किया था. कांग्रेस के समय 2022 तक लगभग 500 मिलियन भारतीयों का Skill develop करने का लक्ष्य रखा था. भाजपा ने 40 करोड़ लोगों को कुशल बनाने का लक्ष्य रखा है. सरकार ने इस योजना में उद्यमी संस्थाओं को जोड़ा हैं और भारत में काम करने वाली सभी गैर-सरकारी संस्थानों से भी संबंध स्थापित किया है. कांग्रेस के समय ये योजना 20 मंत्रालयों द्वारा संचालित की जाती अब मोदी सरकार ने इसे एक मंत्रालय द्वारा संचालित की जा रही है.

कौशल भारत–कुशल भारत मिशन के लाभ(Benefits of Skill India):

कौशल भारत मिशन के जरिये मोदी सरकार ने गरीब और संसाधनों से वंचित युवाओं को प्रशिक्षित करके बेरोजगारी की समस्या और गरीबी को देश से खत्म करने का लक्ष्य रखा है.
इस मिशन का Mission प्रशिक्षण के जरिये युवाओं में आत्मविश्वास को लाना है जिससे उत्पादकता में वृद्धि हो सके. इस योजना में सरकारी, निजी और गैर-सरकारी संस्थानों के साथ साथ शैक्षिक संस्थाएं भी मिलकर काम करेंगी.

इस मिशन के कुछ मुख्य लाभ निम्नलिखित है:

  • इस मिशन के माध्यम से युवाओं को प्रशिक्षित करके भारत में बेरोजगारी की समस्या के निवारण में सहायता करना.
  • उत्पादकता में वृद्धि करना.
  • भारत से गरीबी खत्म करने में सहायता करना.
  • भारतीयों में छिपी हुई योग्यता को बढ़ावा देना.
  • राष्ट्रीय आय के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करना.
  • लोगों की जीवन निर्वाह आय में वृद्धि करना.
  • भारतीयों के जीवन स्तर में सुधार करना.

आप अपनी रूचि के अनुसार अपने स्किल को निखार सकते हैं इसके लिए सरकार आपकी हर संभव मदद करने के लिए तैयार है आप इस लिंक https://www.nsdcindia.org/hi/ पर जाकर अपनी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं.

विश्वकर्मा जयंती क्यों मनाई जाती है

विश्वकर्मा पूजा!!!
विश्वकर्मा पूजा

विश्वकर्मा पूजा क्यों मनाते है? और विश्वकर्मा भागवान का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में आता है जिसने विश्व का निर्माण किया हो.

नवरात्र में भूल कर भी ना करें ये काम

यहां पर हम आपको विश्वकर्मा पूजा की विधि से लेकर विश्वकर्मा के जीवन से जुड़ी सभी पौराणिक और वैदिक बाते बताएंगे जो इससे पहले शायद आपको ना पता हों.
भागवान विश्वकर्मा ने ही पूरी सृष्टि का निर्माण किया है वो इस जगत के शिल्पकार हैं.
अगर आपको हिंदी के इन भरी-भरकम शब्दों को समझने में दिक्कत हो रही है तो आप इन्हें आज के हिसाब से Engineer भी कह सकते हैं.

विश्वकर्मा जयंती कब मनाई जाती है (Day of celebration):
विश्वकर्मा जयंती हर साल कन्या सक्रांति के दिन मनाई जाती है. इस साल 2017 में इसे 17 सितम्बर Sunday को मनाया जाएगा.
विश्वकर्मा पूजा सभी इंजीनियर, उपकरण और धातु बनाने वाले लोग बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं. इस दिन वो अपने औज़ार और हथियार की भी पूजा करते हैं.
पुराणों और वेदो के अनुसार भागवान विश्वकर्मा ने ही भागवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका, शंकर भागवान द्वारा रावण को भेट की गयी लंका और युधिष्ठिर की नगरी इंद्रप्रस्थ का निर्माण अपने हांथों से किया था.

विश्वकर्मा का जन्म(Birth of Vishwkarma):
विश्वकर्मा पूजा

पुराणों के अनुसार भागवान विष्णु के अवतार के वक्त उनके नाभि में ब्रम्हा जी विराजमान थे. भागवान ब्रम्हा को जगत का रचयिता कहा जाता है. ब्रम्हा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जोकि स्वयं भागवान विश्वकर्मा थे जो अपने पिता के तरह ही श्रेष्ठ शिल्पकार बने और ब्रम्हांड का निर्माण करने लगे.

विश्वकर्मा पूजा कथा (Katha of Vishwkarma Puja):
पुराने समय में एक व्यापारी था जो दिन-रात कड़ी मेहनत करता था. उसकी पत्नी भी उसके साथ बहुत मेहनत करती थी लेकिन उनके नसीब में सुख दूर-दूर तक नहीं था.
इसलिए उन्हें अमावस्या के दिन विश्वकर्मा भागवान की पूजा करने की बात किसी व्यक्ति ने बताई. उस आदमी के कहे अनुसार दोनों ने भागवान विश्वकर्मा की पूजा की उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और उनका जीवन आराम से गुजरने लगा.
इस तरह भागवान विश्वकर्म के व्रत का फल उन्हें मिला.

विश्वकर्म पूजा विधि(Vishwkarma Puja vidhi):
भागवान विश्वकर्म की पूजा उनकी मूर्ति को स्थापित करके की जाती है. पुराणों और वेदों में इनकी विभिन्न प्रकार के चित्र देखने को मिलते हैं.
सुबह नित्य कर्म के बाद ही पूजा आरम्भ करें.
हर पूजा में पत्नी का साथ होना आवश्यक है लेकिन यह पूजा में विशेष रूप से अर्धांगिनी के साथ करना चाहिए.
पत्नी के साथ मिलकर ही यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिए.
हाथ में चावल लेकर विश्कर्मा जी को स्मरण कर इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “ॐ आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम: ओम अनन्तम नम:, पृथिव्यै नमः या ॐ श्री श्रिष्टनतया सर्वसिद्धहया विष्वकर्माया नमो नमः”

विश्वकर्मा जी की आरती(Arti of lord Vishwkarma):

जय विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा
सकल सृष्टि के करता रक्षक स्तुति धर्मा
आदि सृष्टि में विधि को श्रुति का उपदेश दिया
जीव मात्र का जग में विकास किया
ऋषि अंगिरा तप से शांति नहीं पायी
रोग ग्रस्त राजा ने जब आश्रय लीना
संकट मोचन बनकर दुःख दूर कीना
जय विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा
जब रथकार दम्पति तुम्हारी तेर करी
सुनकर दीन प्रार्थना विपत हरी सगरी
एकानन, चतुरानन पंचानन राजे
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज सकल रूप साजे
ध्यान धरे तब पद का सकल सिद्धि आवे
मन दुविधा मिट जावे सकल सिद्धि पावे
मन दुविधा मिट जावे अटल शक्ति पावे
श्री विश्वकर्मा जी की आरती जो कोई नर गावे
भजत गजानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे.