विश्वकर्मा जयंती क्यों मनाई जाती है

विश्वकर्मा पूजा!!!
विश्वकर्मा पूजा

विश्वकर्मा पूजा क्यों मनाते है? और विश्वकर्मा भागवान का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में आता है जिसने विश्व का निर्माण किया हो.

नवरात्र में भूल कर भी ना करें ये काम

यहां पर हम आपको विश्वकर्मा पूजा की विधि से लेकर विश्वकर्मा के जीवन से जुड़ी सभी पौराणिक और वैदिक बाते बताएंगे जो इससे पहले शायद आपको ना पता हों.
भागवान विश्वकर्मा ने ही पूरी सृष्टि का निर्माण किया है वो इस जगत के शिल्पकार हैं.
अगर आपको हिंदी के इन भरी-भरकम शब्दों को समझने में दिक्कत हो रही है तो आप इन्हें आज के हिसाब से Engineer भी कह सकते हैं.

विश्वकर्मा जयंती कब मनाई जाती है (Day of celebration):
विश्वकर्मा जयंती हर साल कन्या सक्रांति के दिन मनाई जाती है. इस साल 2017 में इसे 17 सितम्बर Sunday को मनाया जाएगा.
विश्वकर्मा पूजा सभी इंजीनियर, उपकरण और धातु बनाने वाले लोग बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं. इस दिन वो अपने औज़ार और हथियार की भी पूजा करते हैं.
पुराणों और वेदो के अनुसार भागवान विश्वकर्मा ने ही भागवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका, शंकर भागवान द्वारा रावण को भेट की गयी लंका और युधिष्ठिर की नगरी इंद्रप्रस्थ का निर्माण अपने हांथों से किया था.

विश्वकर्मा का जन्म(Birth of Vishwkarma):
विश्वकर्मा पूजा

पुराणों के अनुसार भागवान विष्णु के अवतार के वक्त उनके नाभि में ब्रम्हा जी विराजमान थे. भागवान ब्रम्हा को जगत का रचयिता कहा जाता है. ब्रम्हा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जोकि स्वयं भागवान विश्वकर्मा थे जो अपने पिता के तरह ही श्रेष्ठ शिल्पकार बने और ब्रम्हांड का निर्माण करने लगे.

विश्वकर्मा पूजा कथा (Katha of Vishwkarma Puja):
पुराने समय में एक व्यापारी था जो दिन-रात कड़ी मेहनत करता था. उसकी पत्नी भी उसके साथ बहुत मेहनत करती थी लेकिन उनके नसीब में सुख दूर-दूर तक नहीं था.
इसलिए उन्हें अमावस्या के दिन विश्वकर्मा भागवान की पूजा करने की बात किसी व्यक्ति ने बताई. उस आदमी के कहे अनुसार दोनों ने भागवान विश्वकर्मा की पूजा की उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और उनका जीवन आराम से गुजरने लगा.
इस तरह भागवान विश्वकर्म के व्रत का फल उन्हें मिला.

विश्वकर्म पूजा विधि(Vishwkarma Puja vidhi):
भागवान विश्वकर्म की पूजा उनकी मूर्ति को स्थापित करके की जाती है. पुराणों और वेदों में इनकी विभिन्न प्रकार के चित्र देखने को मिलते हैं.
सुबह नित्य कर्म के बाद ही पूजा आरम्भ करें.
हर पूजा में पत्नी का साथ होना आवश्यक है लेकिन यह पूजा में विशेष रूप से अर्धांगिनी के साथ करना चाहिए.
पत्नी के साथ मिलकर ही यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिए.
हाथ में चावल लेकर विश्कर्मा जी को स्मरण कर इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “ॐ आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम: ओम अनन्तम नम:, पृथिव्यै नमः या ॐ श्री श्रिष्टनतया सर्वसिद्धहया विष्वकर्माया नमो नमः”

विश्वकर्मा जी की आरती(Arti of lord Vishwkarma):

जय विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा
सकल सृष्टि के करता रक्षक स्तुति धर्मा
आदि सृष्टि में विधि को श्रुति का उपदेश दिया
जीव मात्र का जग में विकास किया
ऋषि अंगिरा तप से शांति नहीं पायी
रोग ग्रस्त राजा ने जब आश्रय लीना
संकट मोचन बनकर दुःख दूर कीना
जय विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा
जब रथकार दम्पति तुम्हारी तेर करी
सुनकर दीन प्रार्थना विपत हरी सगरी
एकानन, चतुरानन पंचानन राजे
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज सकल रूप साजे
ध्यान धरे तब पद का सकल सिद्धि आवे
मन दुविधा मिट जावे सकल सिद्धि पावे
मन दुविधा मिट जावे अटल शक्ति पावे
श्री विश्वकर्मा जी की आरती जो कोई नर गावे
भजत गजानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे.

World Tourism Day

World Tourism Day!!! विश्व पर्यटन दिवस, दुनियाभर में 27 सितंबर को वर्ल्ड टूरिज्म डे मनाया जाता है. 1980 में यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड टूरिज्म ऑर्गनाइजेशन ने World Tourism Day की शुरुआत की. इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पर्यटन  को लेकर लोगों में जागरूकता लाना है. साथ ही, ये बताना है कि पर्यटन किस तरह सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मूल्यों को प्रभावित करता है. World Tourism Day हर साल अलग-अलग थीम पर मनाया जाता है.

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World Tourism Day
World Tourism Day समारोह संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन द्वारा 1980 में शुरु किया गया जो प्रत्येक वर्ष 27 सितम्बर को मनाया जाता है. यह विशेष दिन इसलिये चुना गया क्योंकि इस दिन 1970 में W.T.O(World trde Organization) के कानून प्रभाव में आये थे. जिसे विश्व पर्यटन के क्षेत्र में बहुत बडा मील का पत्थर माना जाता है, इसका लक्ष्य विश्व पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक मूल्यों को वैश्विक स्तर पर कैसे प्रभावित करता है, के बारे में लोगों को जागरुक करना है. ये दिन हर साल एक विशेष विषय के साथ लोगों को जागरुक करने के लिये पूरे विश्व में मनाया जाता है.

World Tourism Day

World Tourism Day:
हर वर्ष आम जनता के लिए एक संदेश W.T.O के महासचिव द्वारा इस अवसर में भाग लेने के लिए भेजा जाता है. ये विभिन्न पर्यटन उद्यमों, संगठनों, सरकारी एजेंसियों और आदि के द्वारा बहुत रुचि के साथ मनाया जाता है. इस दिन विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएँ जैसे
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये फोटो प्रतियोगिता,
मुफ्त प्रवेश के साथ पर्यटन पुरस्कार प्रस्तुतियाँ,
आम जनता के लिये छूट आदि आयोजित किये जाते हैं.
tourism विकासशील देशों के लिए आय का मुख्य स्रोत बन गया है.

World Tourism Day Theme so far:

  • 1980 का विषय “सांस्कृतिक विरासत और शांति और आपसी समझ के संरक्षण के लिए पर्यटन का योगदान” था.
  • 1981 का विषय “पर्यटन और जीवन की गुणवत्ता” था.
  • 1982 का विषय “यात्रा में गर्व: अच्छे मेहमान और अच्छे मेजबान” था.
  • 1984 का विषय “अंतरराष्ट्रीय समझ, शांति और सहयोग के लिए पर्यटन” था.
  • 1985 का विषय “युवा पर्यटन: शांति और दोस्ती के लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत” था.
  • 1986 का विषय “पर्यटन: विश्व शांति के लिए एक महत्वपूर्ण शक्ति” था.
  • 1987 का विषय “विकास के लिए पर्यटन” था.
  • 1988 का विषय “पर्यटन सभी के लिए शिक्षा” था.
  • 1989 का विषय “पर्यटकों का मुक्त आवागमन एक दुनिया बनाता है” था.
  • 1990 का विषय था “पर्यटन: एक अपरिचित उद्योग, एक मुक्त सेवा”.
  • 1991 का विषय “संचार, सूचना और शिक्षा: पर्यटन विकास की शक्ति कारक” था.
  • 1992 का विषय “पर्यटन: एक बढ़ती सामाजिक और आर्थिक एकजुटता का कारक है और लोगों के बीच मुलाकात का” था.
  • 1993 का विषय “पर्यटन विकास और पर्यावरण संरक्षण: एक स्थायी सद्भाव की ओर” था.
  • 1994 का विषय “गुणवत्ता वाले कर्मचारी, गुणवत्ता पर्यटन” था.
  • 1995 का विषय “विश्व व्यापार संगठन: बीस साल से विश्व पर्यटन में सेवारत” था.
  • 1996 का विषय “पर्यटन: सहिष्णुता और शांति का एक कारक” था.
  • 1997 का विषय “पर्यटन: इक्कीसवीं सदी की रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अग्रणी गतिविधि “
  • 1998 का विषय “सार्वजनिक-निजी क्षेत्र भागीदारी: पर्यटन विकास और संवर्धन की कुंजी” था.
  • 1999 का विषय था “पर्यटन: विश्व धरोहर का नयी शताब्दी के लिये संरक्षण.”
  • 2000 का विषय “प्रौद्योगिकी और प्रकृति: इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में पर्यटन के लिए दो चुनौतियॉ”
  • 2001 का विषय “पर्यटन: सभ्यताओं के बीच शांति और संवाद के लिए एक उपकरण “
  •  2002 का विषय “पर्यावरण पर्यटन सतत विकास के लिए कुंजी”
  • 2003 का विषय “पर्यटन: गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन और सामाजिक सद्भाव के लिए एक प्रेरणा शक्ति”
  • 2004 का विषय “खेल और पर्यटन: आपसी समझ वालो के लिये दो जीवित बल, संस्कृति और समाज का विकास”
  • 2005 का विषय “यात्रा और परिवहन: जूल्स वर्ने की काल्पनिकता से 21 वीं सदी की वास्तविकता तक”
  • 2006 का विषय “पर्यटन को समृद्ध बनाना”
  • 2007 का विषय “पर्यटन महिलाओं के लिए दरवाजे खोलता है”
  • 2008 का विषय “जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती का जवाब पर्यटन”
  • 2009 का विषय “पर्यटन-विविधता का उत्सव”
  • 2010 का विषय “पर्यटन और जैव विविधता”
  • 2011 की विषय “पर्यटन संस्कृति को जोड़ता है”
  • 2012 का विषय “पर्यटन और ऊर्जावान स्थिरता”
  • 2013 का विषय “पर्यटन और जल: हमारे साझे भविष्य की रक्षा”
  • 2014 का विषय “पर्यटन और सामुदायिक विकास”
  • 2015 का विषय “लाखों पर्यटक, लाखों अवसर”
  • 2016 का विषय “सभी के लिए पर्यटन”

विश्व पर्यटन संगठन WTO ने वर्ष 1975 में विश्व के पचास देशों की आधिकारिक सदस्यता के साथ, विश्व स्तर पर पर्यटन उद्योग के संरक्षक के रूप में अपनी गतिविधियों का आरम्भ किया. इस संगठन का एक मूल दायित्व लोगों के बीच संपर्क बनाना एवं इस लोकप्रिय उद्योग को बढ़ावा देना है. विभिन्न आयामों वाले इस उद्योग की विशेषताओं जैसे कि
नए प्रस्तावों की प्रस्तुति,
आर्थिक एवं सांस्कृतिक और सामाजिक लाभ और उसकी विशेषताओ के विवरण हेतु विस्तृत योजना बनाने की आवश्यकता है.
प्रतिवर्ष विश्व पर्यटन संगठन के सदस्य दृष्टिगत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सम्मेलनों एवं बैठकों में विभिन्न प्रकार के निर्णय लेते हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में, WTO  के सदस्यों एवं सचिवालय ने यह निर्णय लिया कि एक विस्तृत संदेश द्वारा विश्व समुदाय का ध्यान पर्यटन की ओर आकृष्ट कराएं और सरकारों, समाज, विश्वविद्यालयों एवं इस विषय से संबंधित समस्त विभागों को इसकी ओर प्रोत्साहित करें ताकि आम लोगों के जीवन में पर्यटन अपना स्थान बना ले.

1980 से यह निर्णय लिया गया कि प्रतिवर्ष WTO की ओर से एक संदेश दिया जाए और समस्त सदस्य देश इस संदेश के अंतरगत पर्यटन उद्योग से संबंधित अपनी योजनाएं बनाएं और उनका क्रियान्वयन करें.
पर्यटन को जारी रखने के लिए स्वच्छ एवं शुद्ध पानी का उपलब्ध होना अति महत्वपूर्ण है कि जिसमें विस्तृत रूप से होटलों और रेस्टोरेंटों की श्रंखलाओं से लेकर परिवहन एवं मनोरंजन के साधन भी शामिल होते हैं.
विश्व पर्यटन संगठन ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में घोषणा की है कि वैश्विक आर्थिक समस्याओं के बावजूद, अधिकांश देशों में पर्यटन उद्योग में विस्तार हो रही है प्रतिवर्ष करोंड़ों लोग विश्व के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर जाते हैं.

Happy Tourism Day!!

World Alzheimer Day

World Alzheimer Day!!! Alzheimer की वजह से हमारी ज़िंदगी के मामूली रुटीन भी प्रभावित होने लगता है और हम मुश्किलों से घिर जाते हैं.
Internet addiction बर्बाद ना कर दे आपकी ज़िंदगी

World Alzheimer Day
21 सितम्बर को World Alzheimer Day के रूप में मनाया जाता है दुनिया के बड़े-बड़े संगठन और सेलिब्रिटी इस बीमारी के प्रति लोगो को जागरूक बनाने के लिए और पीड़ित लोगों की आर्थिक मदद के लिए चैरिटी शो भी करते हैं.

History of Alzheimer:
World Alzheimer Day

World Alzheimer Day: डॉक्टर ओलिस अल्ज़ाइमर ने इस बीमारी का पता लगाया था उनके नाम पर ही इस बीमारी का नाम एल्ज़िमर रखा गया. लाज़िमेर ने मृत्यु के बाद एक महिला के मस्तिष्क के ऊतकों में परिवर्तन देखा उस महिला की मौत दिमागी बीमारी से हुई थी. उस महिला के दिमाग का अल्ज़ाइमर ने परिक्षण किया और पाया की उसके दिमाग में ऊतकों के कुछ टुकड़े फसे हुए हैं और साथ ही अन्य परेशानियां एमलौइड प्लेक भी था.
अल्ज़ाइमर ने पाया की महिला के मौत का मुख्य कारण प्लेक और ऊतकों का उलझना है और अल्ज़ाइमर ने यह भी पता लगाया कि इस बीमारी का कारण तंत्रिका कोशिकाओं और मस्तिष्क न्यूरॉन्स के बीच संपर्क ना हो पाना है.

अल्ज़ाइमर से जुड़े तथ्य:

  • दुनियाभर  में 35 मिलियन लोग इस बीमारी से पीड़ित है.
  • यह रोग एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में चलता है.
  • इस रोग का अभी तक कोई समाधान नहीं है रिसर्च जारी है.

अल्जाइमर, दिमागी बीमारी है. और इससे एक आम इंसान की सोचने समझने कि क्षमता कम हो जाती है और कभी-कभी तो ख़त्म हो जाती है. जिससे आगे आने वाले समय में साधारण जिंदगी जीने में मुश्किल होती है. यह एक लाइलाज बीमारी है. अकेले केवल भारत में ही 50 लाख से भी ज़्यादा लोग मानसिक बीमारी का सामना कर रहे हैं, और इन बीमार लोगों में से  80 प्रतिशत लोगों को अल्जाइमर है. डॉक्टरों का कहना है कि 2030 में यह संख्या दोगुनी हो सकती है.

अगर आप सचेत रहे तो शुरूआती दौर में ही इस बीमारी का पता चल सकता है, किसी व्यक्ति के व्यक्ति के रोज़ के व्यवहार से पता लगा सकते हैं. याददाश्त का कमजोर होना, समय और जगह से भटकाव होना, एक ही सवाल को बार-बार पूछना, आसान गिनती न कर पाना, रिश्तेदारों के नाम भूलना और स्वभाव में बदलाव आना ये सभी अल्जाइमर होने के संकेत हो सकते हैं .

अल्जाइमर बीमारी, दिमाग में एमलौइड नामक प्रोटीन के इक्ट्ठा होने से होती है. अक्सर यह देखा गया है कि यह बीमारी बढ़ती उम्र में होती है. इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है. अगर कोई व्यक्ति इस बीमारी से बचना चाहता है, तो वह अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करता रहे, पूरी नींद ले, दिमागी और प्राकृतिक रूप से सक्रिय रहे, पढ़ते-लिखते रहने से इस बीमारी से बचा जा सकता है.

आज के समय में लोग अल्जाइमर जैसी बीमारी के बारे में जागरूक हो चुके हैं. जो कि एक काफी अच्छी चीज़ है. यहां तक कि लोग इस बीमारी के संकेत को भी बेहतर तरीके से पहचानने लगे हैं. फिर भी और बेहतर तरीके से इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरूक करना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि कई बार परिवार वालों को मरीज से कैसे बर्ताव करना है, इसके बार में जानकारी नहीं होती है.

कैसे करें देखभाल:
अल्ज़ाइमर से पीड़ित व्यक्ति को संभालना अपने आप में एक बहुत चुनौती भरा काम है. लेकिन पीड़ित जब कोई अपना होता है तो लोग हर मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं .

  • पीड़ित व्यक्ति की देखभाल करने वाले व्यक्ति को उसके साथ दोस्ताना व्यवहार रखना चाहिए.
  • शरीरिक सक्रियता बेहद जरुरी होती है इसलिए बीमार व्यक्ति को व्यायाम और अन्य गेम में व्यस्त रखें.
  • इस वक्त रोगियों को उनका दैनिक काम पूरा करने के लिए देखभाल मदद और प्यार कि जरूरत होती है .

14 September, Hindi Day

दोस्तों हम 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मानते हैं  पर आप जानते हैं क्यों मनाया जाता है हिंदी दिवस. दोस्तों हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है और इसे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है.
भारत में Bullet train, 14 सितम्बर से शुरू होगा काम

हिंदी दिवस

दोस्तों 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था. लोगों को हिंदी के महत्व के विषय में बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा.

हिंदी दिवस
दोस्तों 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहल की थी. क्योंकि हिंदी देश के अधिकतर हिस्सों में बोली और समझी जाती थी इसलिए गांधी जी ने हिंदी को जनमानस की भाषा भी बताया था.

दोस्तों साल 1949 में स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जिसे भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में बताया गया है कि राष्ट्र की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. दोस्तों  क्योंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था. इसी कारण से इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया और मनाया जाने लगा

लेकिन जब राजभाषा के रूप में हिंदी को चुना गया और तो गैर हिन्दी भाषी राज्य खासकर दक्षिण भारत के लोगों ने इसका विरोध किया फलस्वरुप अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा.

दोस्तों अंग्रेजी जुबान और मानसिकता के कारण आज के समय में हिंदी भाषा लोगों के बीच से कहीं-न-कहीं गायब होती जा रही है और इंग्लिश ने अपना प्रभुत्व जमा लिया है. और अगर इसी तरह चलता रहा तो दोस्तों वो दिन दूर नहीं जब हिंदी भाषा हमारे बीच से गायब हो जाएगी. दोस्तों अगर हमे हिंदी भाषा को आने वाली पीढ़ीयों तक पहुँचाना है तो हमे हिंदी भाषा को संजोए रखना होगा इसके प्रचार-प्रसार को बढ़ाना होगा और सरकारी कामकाज में हिंदी को प्राथमिकता देनी होगी. तभी हिंदी भाषा को जिंदा रखा जा सकता है.
हिन्दी दिवस सभी स्कूल, कॉलेजों और दफ्तरों में मनाया जाता है। इस दिन लगभग सभी दोस्तों आजके दिन शैक्षिक संस्थानों में कई प्रकार के प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता हैं जिनमें स्कूल के बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी भाग लेते हैं.
इस दिन हिन्दी कविताएँ, कहानियाँ और शब्दावली के ऊपर प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं. दोस्तों भारत में आपको हर जगह हिंदी भाषा की अच्छी समझ रखने वाले लोग मिल जाएंगे   लेकिन उत्तर भारत में हिन्दी भाषा का ज्यादा बोल-चाल है.
इस दिन भारत के राष्ट्रपति हिन्दी साहित्य से जुड़े कई लोगो को अवार्ड प्रदान करते हैं और उनको सम्मानित करते हैं.हिन्दी दिवस के अवसर पर राजभाषा कीर्ति पुरस्कार, और राजभाषा गौरव पुरस्कार जैसे पुरस्कार दिए जाते हैं.
दोस्तों किसी भी भाषा को राष्ट्र भाषा चुनने से पहले उसके कुछ विशेष गुण देखे जाते हैं. उस भाषा को देश के ज्यादातर भागों में लिखा पढ़ा जाता हो या उन्हें समझ हो. उस भाषा की शब्दावली  इतनी समर्थ हो की उससे सभी प्रकार के विषयों को अभिव्यक्त किया जा सके.
साथ ही ऐसी भाषा का के साहित्य का एक विशाल भंडार होना चाहिए तथा दर्शन, ज्योतिष और इतिहास के विषय में सभी पुस्तकें होनी चाहिए. भाषा का सुन्दर और सरल होना और भी आवश्यक है.लेकिन भारत में कई भाषाएं बोली जाती हैं इसलिए कुछ लोगों ने हिंदी के राष्ट्र भाषा बनने पर कड़ा ऐतराज जताया और भाषा के आधार पर राज्यों की मांग करने लगे इसलिए हिंदी को आज तक राष्ट्र भाषा की रूप में प्रतिस्थापित नहीं किया जा सका.

हिंदी दिवस पर अनमोल वचन:

  • मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूं पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं सह नहीं सकता: आचार्य विनोबा भावे
  • जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य का गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता: डॉ. राजेंद्र प्रसाद
  • हमारी नागरी लिपी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपी है: राहुल सांकृ्त्यायन
  • हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्त्रोता है: समित्रानंदन पंत
  • सभी भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपी आवश्यक है तो वो देवनागरी ही हो सकती है: जस्टिस कृष्णस्वामी अय्यर
  •  हिंदी का प्रचार और विकास कोई रोक नहीं सकता: पंडित गोविंद बल्लभ पंत
  • हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है: महात्मा गांधी

लाल बहादुर शास्त्री का जीवन परिचय

लाल बहादुर शास्त्री!!!लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री दोस्तों शास्त्री जी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, उनका जीवन बहुत ही प्रेरणादायी रहा है हम सभी उनके जीवन से प्रेरणा ले सकते हैं.  दोस्तों सीधे और सरल स्वभाव के शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के बनारस से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था.
बापू के जीवन से जुड़ीं अनमोल बातें

शास्त्री जी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे. जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था.पति के मृत्यु के बाद शास्त्री जी की माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर रहने लगीं .मुगलसराय में लाल बहादुर शास्त्री की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी के बावजूद उनका बचपन खुशहाल बीता. जब शास्त्री जी थोड़े बड़े हुए तो उन्हें बनारस में अपने चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया . ताकि वे अच्छे विद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर सकें. घर पर सब शास्त्री जी को नन्हें के नाम से बुलाते थे.
शास्त्री जी कई मील का सफर नंगे पाँव तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें आग उगलती और गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था.

बड़े होने के साथ-ही लाल बहादुर शास्त्री विदेशी दासता से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे. वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से बहुत प्रभावित हुए. लाल बहादुर शास्त्री जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था.
शास्त्री जी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, और इस वक्त शास्त्री जी केवल सोलह वर्ष के थे. शास्त्री जी के मन में देश सेवा की भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था. उनके इस निर्णय ने उनकी मां को बहुत हताश किया. उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे. लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था. उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ थे .
लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित किये गए कई राष्ट्रीय संस्थानों में से एक वाराणसी के काशी विद्या पीठ में शामिल हुए. यहाँ वे महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आए. विद्यापीठ द्वारा उन्हें प्रदत्त स्नातक की डिग्री का नाम ‘शास्त्री’ था लेकिन लोगों के दिमाग में यह उनके नाम के एक भाग के रूप में बस गया.

शादी:
दोस्तों 1927 में उनकी शादी हो गई उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था. उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी. दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे. दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं.लाल बहादुर शास्त्रीशास्त्री जी ने 1930 में महात्मा गांधी के साथ नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की. शास्त्री जी ने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया और कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे. आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई उन्हें देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया. उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए. कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तर प्रदेश में एक लोकोक्ति बन गई. दोस्तों 1951 में नई दिल्ली आ गए एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे. उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी. शास्त्री जी ने एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की. उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी. अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी वे कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे एवं अपना योगदान दिया. 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था.

दोस्तों विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति वाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा. शास्त्री जी दूरदर्शी थे जो देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये. दोस्तों लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के राजनीतिक शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थे. अपने गुरु महात्मा गाँधी के ही लहजे में एक बार उन्होंने कहा था – “मेहनत प्रार्थना करने के समान है.” शास्त्री जी की प्रतिभा और निष्ठा को देखते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने 1964 में लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद का उत्तरदायित्व सौंपा. 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमन्त्री का पद भार ग्रहण किया.
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 26 जनवरी, 1965 को देश के जवानों और किसानों को अपने कर्म और निष्ठा के प्रति सुदृढ़ रहने और देश को खाद्य के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने के उद्देश्य से जय जवान, जय किसान‘ का नारा दिया. यह नारा आज भी भारतवर्ष में लोकप्रिय है.
उजबेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के पश्चात 11 जनवरी, 1966 की रात को रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई. सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त शास्त्री जी को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया.

बापू के जीवन से जुड़ीं अनमोल बातें

दोस्तों 2 अक्टूबर आने वाला है और हमे पता है आप बापू यानी की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में कुछ रोचक चीजें जानना चाहते हैं तो दोस्तों तैयार हो जाइये बापू के जीवन के हर सुने-अनसुने पहलुओं को जानने के लिए.

Interview में हमेशा करेंगे Rock कभी नहीं होंगे Flop

जन्म: 2 अक्टूबर, 1869, पोरबंदर, काठियावाड़ (गुजरात)
मृत्यु: 30 जनवरी 1948, दिल्ली
कार्य/उपलब्धियां: सतंत्रता आन्दोलन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई     उपाधि: राष्ट्रपिता

बापूदोस्तों बापू यानी मोहनदास करमचन्द गाँधी का जन्म भारत में गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर में 2 अक्टूबर सन् 1869 को हुआ था. उनके पिता करमचन्द गाँधी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे. दोस्तों मोहनदास की माता का नाम पुतलीबाई था और वह वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखती थीं. उनके धार्मिक Lifestyle का प्रभाव युवा मोहनदास पर पड़ा और इन्हीं मूल्यों ने आगे चलकर उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. वह नियमित रूप से व्रत रखती थीं और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा करती थी. मोहनदास ने स्वाभाविक रूप से अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए व्रत और विभिन्न धर्मों और पंथों को मानने वालों के बीच परस्पर सहिष्णुता को अपनाया.

विवाह:
बापूदोस्तों उस समय बाल विवाह बहुत आम था, बापू का विवाह भी 1883 में साढ़े 13 वर्ष की आयु में 14 वर्ष की कस्तूरबा के साथ हो गया. जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी पहली सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही. बाद में मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं – हरीलाल गाँधी  (1888), मणिलाल गाँधी (1892), रामदास गाँधी (1897) और देवदास गाँधी(1900).

दोस्तों बापू की मिडिल स्कूल की शिक्षा पोरबंदर में और हाई स्कूल की शिक्षा राजकोट में हुई. मोहनदास एक औसत छात्र ही रहे और उनकी हैंड राइटिंग बहुत ही खराब थी जिसका जिक्र बापू ने खुद कई जगह किया है.1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से उत्तीर्ण की. इसके बाद मोहनदास ने भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर ख़राब स्वास्थ्य के कारण वह कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस चले गए.

विदेश में शिक्षा और वकालत:बापू
दोस्तों मोहनदास अपने परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे इसलिए उनके परिवार के लोग ऐसा मानते थे कि वह अपने पिता और चाचा का उत्तराधिकारी (दीवान) बन सकते थे. बापू के  परिवार के मित्र मावजी दवे ने ऐसी सलाह दी कि एक बार मोहनदास लन्दन से बैरिस्टर बन जाएँ तो उनको आसानी से दीवान की पदवी मिल जाएगी. उनकी माता पुतलीबाई और परिवार के अन्य सदस्यों ने बापू के विदेश जाने के विचार का विरोध किया. वर्ष 1888 में मोहनदास यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये. वहां बापू को शाकाहारी खाने से सम्बंधित बहुत कठिनाई हुई और शुरूआती दिनो में कई बार भूखे ही रहना पड़ा. धीरे-धीरे उन्होंने शाकाहारी भोजन वाले रेस्टोरेंट्स के बारे में पता लगा लिया, इसके बाद उन्होंने ‘वेजीटेरियन सोसाइटी’ की सदस्यता भी ग्रहण कर ली. इस सोसाइटी के कुछ सदस्य थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्य भी थे और उन्होंने मोहनदास को गीता  पढ़ने का सुझाव दिया. दोस्तों जून 1891 में गाँधी भारत लौट गए और वहां जाकर उन्हें अपनी मां के मौत के बारे में पता चला. उन्होंने बॉम्बे में वकालत की शुरुआत की पर उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली. इसके बाद बापू राजकोट चले गए जहाँ उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने का कार्य शुरू कर दिया.
बाद में 1893 में बापू ने एक भारतीय फर्म से नेटल (दक्षिण अफ्रीका) में एक वर्ष के करार पर वकालत का कार्य  स्वीकार कर लिया.
दोस्तों एक साल के करार पर गाँधी 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे वह प्रिटोरिया स्थित कुछ भारतीय व्यापारियों के न्यायिक सलाहकार के तौर पर वहां गए थे. उन्होंने अपने जीवन के 21 साल दक्षिण अफ्रीका में बिताये जहाँ उनके राजनैतिक विचार और नेतृत्व कौशल का विकास हुआ. दोस्तों दक्षिण अफ्रीका में उनको नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा. एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बहर फेंक दिया गया. ये सारी घटनाएँ उनके के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ बन गईं दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय को देखते हुए उनके मन में कई सवाल उठनें लगे हैं. दक्षिण अफ्रीका में  बापू ने भारतीयों की नागरिकता सम्बंधित मुद्दे को सरकार के सामने उठाया और सन 1906 के ज़ुलु युद्ध में भारतीयों को भर्ती करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को सक्रिय रूप से प्रेरित किया.

चम्पारण सत्याग्रह:बापू1914 में बापू दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आये. दोस्तों बिहार के चम्पारण और गुजरात के खेड़ा में हुए आंदोलनों ने गाँधी को भारत में पहली राजनैतिक सफलता दिलाई. चंपारण में ब्रिटिश ज़मींदार किसानों को फसलों की बजाए नील की खेती करने के लिए मजबूर करते थे और सस्ते मूल्य पर फसल खरीदते थे जिससे किसानों की स्थिति बदतर हो रही थी. गांधी जी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों का नेतृत्व किया जिसके बाद गरीब और किसानों की मांगों को माना गया.

खिलाफत आन्दोलन:  बापूदोस्तों खिलाफत आंदोलन के जरिये कांग्रेस पार्टी में मुस्लिमों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का मौका मिला. खिलाफत एक विश्वव्यापी आन्दोलन था जिसके द्वारा खलीफा के गिरते प्रभुत्व का विरोध सारी दुनिया के मुसलमानों द्वारा किया जा रहा था. भारत में खिलाफत का नेतृत्व ‘आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस’ द्वारा किया जा रहा था.दोस्तों धीरे-धीरे गाँधी इसके मुख्य प्रवक्ता बन गए.  इसके बाद गाँधी न सिर्फ कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिसका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर था.

असहयोग आन्दोलन:बापू
गाँधी जी का मानना था की भारत में अंग्रेजी हुकुमत भारतीयों के सहयोग से ही संभव हो पाई थी. और अगर हम सब मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ हर बात पर असहयोग करें तो आजादी संभव है. गाँधी जी की बढती लोकप्रियता ने उन्हें कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बना दिया था और अब वह इस स्थिति में थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार जैसे अस्त्रों का प्रयोग कर सकें. इसी बीच जलियावांला नरसंहार ने देश को भारी आघात पहुंचाया जिससे जनता में क्रोध और हिंसा की ज्वाला भड़क उठी . गांधी जी ने स्वदेशी नीति का आह्वान किया जिसमें विदेशी वस्तुओं विशेषकर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना था. उनका कहना था कि सभी भारतीय अंग्रेजों द्वारा बनाए वस्त्रों की जगह हमारे अपने लोगों द्वारा हाथ से बनाई गई खादी पहनें. उन्होंने पुरूषों और महिलाओं को प्रतिदिन सूत कातने के लिए कहा. इसके अलावा महात्मा गाँधी ने ब्रिटेन की शैक्षिक संस्थाओं और अदालतों का बहिष्कार, सरकारी नौकरियों को छोड़ने तथा अंग्रेजी सरकार से मिले तमगों और सम्मान को वापस लौटाने का भी अनुरोध किया. असहयोग आन्दोलन को अपार सफलता मिल रही थी जिससे समाज के सभी वर्गों में जोश और भागीदारी बढ गई लेकिन फरवरी 1922 में इसका अंत चौरी-चौरा कांड के साथ हो गया.

देश का विभाजन और आजादी:
दोस्तों Second World war के समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश को आज़ाद करने का संकेत दे दिया था. भारत की आजादी के आन्दोलन के साथ-साथ, जिन्ना के नेतृत्व में एक ‘अलग मुसलमान बाहुल्य देश’ (पाकिस्तान) की  मांग तेज हो गयी  और 40 के दशक में इन ताकतों ने एक अलग राष्ट्र  ‘पाकिस्तान’ की मांग को वास्तविकता में बदल दिया था. गाँधी जी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे क्योंकि यह उनके धार्मिक एकता के सिद्धांत से बिलकुल अलग था पर ऐसा हो न पाया .

गाँधी जी की हत्या:बापू
30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की दिल्ली के ‘बिरला हाउस’ में शाम 5:17 पर हत्या कर दी गयी. वह प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे. जब हत्यारे नाथूराम गोडसे ने उनके सीने में 3 गोलियां दाग दी. ऐसे माना जाता है की ‘हे राम’ उनके मुख से निकले अंतिम शब्द थे. नाथूराम गोडसे और उसके सहयोगी पर मुकदमा चलाया गया और 1949 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी.

World ozone day,16 september

World ozone day! दोस्तों हम 16 सितम्बर को World ozone day मनातें हैं. आपको बता दें की  23 जनवरी, 1995 को United Nations
Organization (U.N.O)की आम सभा में पूरे विश्व में, ओजोन के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए 16 सितंबर को International ozone day के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया. लक्ष्य 2010 तक रखा गया था. U.N.O को यकीन था कि 2010 ओजोन मित्र Environment बनाया जा सकेगा लेकिन ये लक्ष्य पूरी तरह से पूरा नहीं किया जा सका.

World ozone day

दोस्तों स्वच्छ भारत अभियान पर कविता जरूर पढ़ें

ओजोन क्या है:
ओजोन एक हल्के नीले रंग की गैस होती है.ओजोन परत सामान्यत: धरातल से 10 किलोमीटर से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच पाई जाती है यह गैस सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के लिए फिल्टर का काम करती है.
Ozone Oxygen के तीन atoms से मिलकर बनने वाली एक गैस है, जो कि वातावरण में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है. निचले वातावरण में पृथ्वी के निकट इसकी उपस्थिति प्रदूषण को बढ़ाने वाली और मानव ऊतक के लिए Harmful है, वहीं ऊपरी वायुमंडल में इसकी उपस्थिति जरुरी है. दोस्तों आपको बता दें कि यह गैस प्राकृतिक रूप से बनती है. जब सूर्य की किरणें वायुमंडल से ऊपरी सतह पर ऑक्सीजन से टकराती हैं तो High energy radiation से इसका कुछ हिस्सा ओज़ोन में परिवर्तित हो जाता है, इसके अलावा बादल, आकाशीय बिजली एवं मोटरों के विद्युत स्पार्क से भी ऑक्सीजन ओज़ोन में बदल जाती है.

पराबैगनी किरणों से नुकसान(Harmfulness of UV rays):
आमतौर पर Ultra violet radiation सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली एक किरण है, जिसमें ज्यादा Energy होती है. और यह energy ओजोन की परत को नष्ट या पतला देती है. ओजोन परत हमें उन किरणों से बचाती है, जिनसे कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है .UV Radiation की बढ़ती मात्रा से Skin cancer, मोतियाबिंद के अलावा शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है. इसके अलावा इसका असर जैविक विविधता पर भी पड़ता है और कई फसलें नष्ट हो सकती हैं.

ओजोन दिवस का इतिहास(History of ozone day):
ओजोन परत के संरक्षण के लिए International ozone day को विश्व ओजोन दिवस के रूप में भी जाना जाता है .यह प्रत्येक वर्ष 16 सितम्बर को मनाया जाता है.
वर्ष 2015 के लिए World ozone day का विषय “30 year of healing the ozone together था. इस विषय को नारे  All there between you and UV से पूरा किया गया.

वर्ष 2015, ओजोन परत की संरक्षण के लिए किए गए वियना कन्वेंशन सम्मेलन में World ozone day की 30वीं वर्षगांठ मनाई गयी .

ओजोन परत के संरक्षण के लिए World ozone day के बारे में:
वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 16 सितंबर को ओजोन परत के संरक्षण के लिए World ozone day के रूप में मनाने की घोषणा की.

मांट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal protocol):
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) तथा अन्य ओजोन ह्रासक पदार्थो, जैसे-हैलोन तथा कार्बन टेट्राक्लोराइड, पर नियंत्रण करने तथा वर्ष 2000 तक उन्हें पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करने के लिये कदम उठाया. ओजोन परत पर विएना convention तथा उसके बाद ओजोन स्तर का ह्रास करने वाले पदार्थों पर मांट्रियल प्रोटोकॉल, जिसे 1987 में अपनाया गया तथा 1990 में और अधिक मजबूत बनाया गया. CFC तथा अन्य हानिकारक गैसों को समाप्त करने के लिए वर्ष 2000 की समय सीमा निर्धारित की थी. प्रोटोकॉल ने ओजोन क्षयकारकों तथा उन पर आधारित पदार्थों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिये नियमों का निर्धारण किया. चूंकि विकासशील देश विकसित देशों की तुलना में तकनीकी और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, वे CFC को नियंत्रित करने में कठिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. अतः मांट्रियल प्रोटोकॉल के प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू करने के लिये इन देशों को दस वर्ष (अर्थात् 2010 तक) की छूट दी गई.

दोस्तों ओजोन परत को बचने के लिए वैश्विक पटल से बहुत कोशिशें हो रहीं है. हमारी भी ज़िम्मेदारी बनती है हानिकारक गैस वाली चीजों का प्रयोग धीरे-धीरे काम करे और नेचर के प्रति हमारी जो जिम्मेदारी है उसे निभाएं. ओजोन को बचाने का संकल्प हम सबके सहयोग से ही पूरा होगा.

शिक्षक दिवस पर बच्चो के लिए हिंदी कविता

शिक्षक दिवस पर कविता में पिरोये कुछ शब्दों से अपने शिक्षक को अपने जीवन में उनका योगदान बताये. इस प्यारी सी कविता के माध्यम से हम उनको इस शिक्षक दिवस पर दे सकतें हैं कुछ शब्दों का ही खास तोहफा…..

शिक्षक दिवस पर कविता

तो आप भी इन शब्दों को समझने की कोशिश करे. और सोचे की अगर हमारी life में teacher नहीं होते तो हमारा सबका जीवन कैसा होता?

हैप्पी टीचर्स डे!!! आइए उनकों स्पेशल फील कराए, जिन्होनें बनाया है आपको स्पेशल

“कौन पढ़ता हमें जीवन का पहला, दूसरा, तीसरा….पाठ?
कैसे करते कैसे सोचते कि छह पंजे होते हैं साठ
और कौन कराता इस खूबसूरत दुनिया से परिचित?
कैसे जानते इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित?”

शिक्षक दिवस की यह कविता भी जरूर पढ़े

तो चलिए पढ़ते हैं शिक्षक दिवस पर कविता

“गुरु ने हमको शिक्षा का पाठ पढ़ाया
नित दिन हमको जीना सिखाया
फंसे जो हम किसी काम में
हाथ पकड़कर सही मार्ग दिखाया
उनकी ही मधुर वाणी से
जीवन में हमारे भी मिठास आया
ये भी आया वो भी आया
हमको सब लिखना पढ़ना आया
आज जब शिक्षक का दिन आया
हमने भी उनके ही लिए
कुछ नाम कमाया
करके प्यारे टीचर का नाम रोशन
इस दिन को यादगार बनाया”

 

“गुरु हमारे इतने अच्छे हैं
हम भी उनके जैसे सच्चे हैं
रोज हमें वो अच्छी बात सिखाते
आदर्शों की कहानी सुनाते
समझ अगर पाठ नहीं आये
तरीका दूसरा वो बतलाते
कभी जोक से, कभी कहानी से
हम बच्चो का मन बहलाते
बैग का बोझ कम कराते
जब भी चाहे हम उनसे कहें
वो हमको नये-नये खेल खिलाते
मुसीबत में बनकर साथी
हमारी नैया पार लगाते
सीखकर उनसे जीवन का पाठ
लक्ष्य में अपने हम बढ़ते जाते
धैर्यता की इसी मिसाल से
हम उनको सदा शीश झुकाते
सारे विषयों का उनको ज्ञान
इसी लिए वो हमें पढ़ाते
हम भी अच्छा पढ़कर उनसे
उनके ही गुणगान हैं गाते
वो ही हमें सम्मान दिलाते
कुछ करने लायक हमें बनाते
कदम-कदम पर बनें परछाई
इसीलिए सच्चा गुरु कहलाते”

आप भी अपना शिक्षक दिवस यादगार रूप में मनाये और हमें कमेंट बॉक्स में बताये कि शिक्षक दिवस पर कविता आपको कैसी लगी?

!!Happy Teachers Day!!

राष्ट्रीय खेल दिवस पर इन खिलड़ियों को किया जाएगा सम्मानित

भारत में 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस(National Sports Day) हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के दिन मनाया जाता है. विश्व में मेजर ध्यानचंद को ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से जाना जाता है.’मेजर ध्यानचंद सिंह’ ने भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलाया था. उनके सम्मान में उनके जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. मेजर ध्यानचंद ने लगातार तीन ओलम्पिक वर्ष 1928, 1932 तथा 1936 में भारत की देश को तीन स्वर्ण पदक दिलाया था.

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इसी दिन खेल में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रपति खेलों में विशेष योगदान के लिए राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं. इन पुरस्कारों में राजीव गांधी खेल रत्न, ध्यानचंद पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार के अलावा तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार मुख्य है. इस मौके पर खिलाड़ियों के साथ अथक मेहनत करने वाले उनके कोचों को भी सम्मानित किया जाता है. भारत में कई जगहों पर इस दिन खेल समारोह का आयोजन किया जाता है, लगभग सभी भारतीय स्कूल और शिक्षण संस्थान ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के दिन  खेल समारोह आयोजित करते हैं.

राष्‍ट्रीय खेल पुरस्‍कार 2017:
दोस्तों राष्‍ट्रीय खेल पुरस्‍कार हर वर्ष खेलों में उम्दा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रीय खेल दिवस पर दिया जाता है.

राजीव गाँधी खेल पुरस्कार:

राष्ट्रीय खेल दिवस
राजीव गाँधी खेल रत्न भारत का खेल जगत् में दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। इस सम्मान का नाम पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी के नाम पर रखा गया। यह सम्मान 1991-92 में शुरू किया गया। खेल के क्षेत्र में सराहना और जागरूकता के लिए इस सम्मान की स्थापना की गयी थी। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों को सम्मानित कर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाना है ताकि वे समाज में अधिक सम्मान प्राप्त कर सकें।

अर्जुन पुरस्कार:

राष्ट्रीय खेल दिवस

अर्जुन पुरस्कार में पुरस्कार स्वरूप पाँच लाख रुपये नकद और अर्जुन की कांस्य प्रतिमा, पारंपरिक पोशाक और एक ‘प्रशस्ति पत्र’ दिया जाता है।

द्रोणाचार्य पुरस्‍कार:

राष्ट्रीय खेल दिवस

द्रोणाचार्य पुरस्कार 1985 में प्रारंभ किये गये थे। यह पुरस्कार खिलाड़ियों और टीमों को प्रशिक्षण प्रदान करने में उत्कृष्ट कार्य करने वाले जाने माने खेल प्रशिक्षकों को प्रदान किये जाते हैं। द्रोणाचार्य पुरस्कार के अंतर्गत गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा, प्रमाणपत्र, पारंपरिक पोशाक और पाँच लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाता है। हर साल अधिकतम 5 खिलाड़ियों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।

मेजर ध्यानचंद पुरस्कार:

  1. राष्ट्रीय खेल दिवस
    ध्यानचंद पुरस्कार खेल-कूद में जीवनभर आजीवन उपलब्धि के लिए 2002 में शुरू किया गया सर्वोच्च पुरस्कार है. ध्यानचंद पुरस्कार महान भारतीय हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद के नाम पर है. यह पुरस्कार अपने शानदार खेल में खेल-कूद के क्षेत्र में योगदान करने और सक्रिय खेल जीवन से अवकाश प्राप्त करने के बाद भी खेल-कूद को बढ़ावा देने के लिए योगदान जारी रखने के लिए दिया जाता. पुरस्कार स्वरुप एक प्रतिमा, प्रमाणपत्र, पारंपरिक पोशाक और पाँच लाख रुपये नकद दिये जाते हैं. हर साल ज़्यादा से ज़्यादा तीन खिलाड़ियों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है.2017 में राष्ट्रीय खेल दिवस इन खिलाडियों को खेल रत्न से सम्मानित किया जाएगा:
    राजीव गांधी खेल रत्‍न 2017:
    श्री देवेन्‍द्र (पैरा एथलिट)
    श्री सरदार सिंह (हॉकी)द्रोणाचार्य पुरस्‍कार 2017:
    स्‍वर्गीय डॉ. आर. गांधी, एथलेटिक्‍स
    श्री हीरा नंद कटारिया, कबड्डी
    श्री जी.एस.एस.वी प्रसाद बैडमिंटन (लाइफ टाइम)
    श्री ब्रिज भूषण मोहंती बॉक्सिंग (लाइफ टाइम)
    श्री पी.ए. राफेल हॉकी (लाइफ टाइम)
    श्री संजॉय चक्रवर्ती निशानेबाजी (लाइफ टाइम)
    श्री रोशन लाल कुश्‍ती (लाइफ टाइम)

अर्जुन पुरस्‍कार 2017:
सुश्री वी.जे. सुरेखा, तीरंदाजी
सुश्री खुशबीर कौर,एथलेटिक्‍स
श्री अरोकिया राजीव,एथलेटिक्‍स
सुश्री प्रशांति सिंह,बास्‍केट बॉल
सूबेदार लैशराम दे‍बेन्‍द्रो सिंह,मुक्‍केबाजी
श्री चेतेश्‍वर पुजारा,क्रिकेट
सुश्री हरमनप्रीत कौर,क्रिकेट
सुश्री ओइनम बेम्‍बम देवी,फुटबॉल
श्री एस.एस.पी. चौरसिया,गोल्‍फ
श्री एस.वी. सुनील,हॉकी
श्री जसवीर सिंह,कबड्डी
श्री पी.एन. प्रकाश,निशानेबाजी
श्री ए. अमलराज,टेबल टेनिस
श्री साकेतमिनेनी,टेनिस
श्री सत्‍यवर्त कादियान,कुश्‍ती
श्री मरियप्‍पन,पैरा-एथलिट
श्री वरुण सिंह भाटी,पैरा-एथलिट

ध्‍यान चंद पुरस्‍कार:
श्री भूपेन्‍द्र सिंह,एथलेटिक्‍स
श्री सैयद शाहिद हकीम,फूटबॉल
सुश्री सुमाराई टेटे, हॉकी

राष्‍ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले विशेष कार्यक्रम में राष्‍ट्रपति पुरस्‍कृत खिलाडि़यों को पुरस्‍कार प्रदान करेंगे.राजीव गांधी खेल रत्‍न से सम्‍मानित खिलाडि़यों को पदक और अलंकरण के अलावा 7.5-7.5 लाख रुपये के नकद पुरस्‍कार से नवाजा जाएगा. अर्जुन, द्रोणाचार्य और ध्‍यान चंद पुरस्‍कार से सम्‍मानित प्रत्‍येक खिलाड़ी को प्रतिमा, प्रमाण पत्र और 5-5 लाख रुपये नकद पुरस्‍कार प्रदान किये जाएंगे.

हैप्पी टीचर्स डे!!! आइए उनकों स्पेशल फील कराए, जिन्होनें बनाया है आपको स्पेशल

टीचर्स डे!!गुरु की महिमा क्या कहें, निर्मल गुरु से ही होए.बिन गुरुवर, जीवन कटु फल सा होए !!

टीचर्स डे

शिक्षक दिवस का हमारे जीवन में विशेष महत्व है, निर्मल ज्ञान, सदाचार आदि सभी शब्दों का पर्याय शिक्षक है, इन खूबियों के बिना मनुष्य का जीवन कड़वे फल की तरह होता है, और बिना गुरु के जीवन का कोई आधार भी नहीं होता.

जान लीजिये क्यों मायने रखता है निजता का अधिकार

आपको बता दें कि हमारा देश, 5 सितम्बर को देश के महान दार्शनिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन टीचर्स डे के रूप में मनाता है. राधाकृष्णन दर्शनशास्त्र यानी Philosophy के Teacher थे, उन्होंने अपने ज्ञान से लोगों को प्रभावित किया था, और खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी उनके ज्ञान से प्रभावित थे, उन्होंने देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में अपने व्याख्यान दिये जो आज भी याद किये जाते हैं.

टीचर्स डे हमें याद ही नहीं रहता है, दोस्तों ज़िंदगी की भागदौड़ में हम इतने व्यस्त हैं कि उन टीचर्स को याद करने का हमारे पास वक्त ही नहीं है. जिनके बिना शायद ही हम जिस मुकाम पर हैं वहां होते. यूँ तो टीचर्स को स्पेशल फील कराने के लिए किसी ख़ास दिन की जरूरत नहीं है, पर फिर भी अगर आप इस टीचर्स डे(5 सितम्बर),थोड़ा सा प्रयास करके उन सभी टीचर्स के फ़ोन नम्बर ढूंढ कर उन्हें एक बार फ़ोन करने की कोशिश कीजिये जिन्हें देखे या जिनसे बात किये वर्षों हो गए हैं. यकीन मानिये दोस्तों आपके टीचर माथे पर बल डालकर आपको याद करने की कोशिश जरूर करेंगे और अगर आप उन्हें याद ना भी आये तो भी वो आपके बैच का ईयर जानकर और ये जानकर की वो अब भी आपके लिए ख़ास हैं बहुत खुश होंगे. आप मम्मी पापा से बात करना, उन्हें याद करना भूलतें हैं? फिर आप  टीचर्स को कैसे भूल सकतें हैं.

अच्छा दोस्तों जब हम टीचर्स की बात करते हैं तो सिर्फ हम अपने स्कूल या कॉलेज टीचर्स तक सिमट कर रह जातें हैं. क्या आपको आपके म्यूजिक वाली मैम,या फिर स्विमिंग वाले सर याद नहीं आते, जिन्होनें आपको ऐसी कलाओं में माहिर बनाया जिसमें आप जीरो थे?

या फिर पड़ोस वाले अंकल जो हमेशा आपको प्रोत्साहित करते हैं कुछ अच्छा करने के लिए कुछ नया करने के लिए, तो आइए इस टीचर्स डे उन सभी लोगों को विश करके उन्हें स्पेशल फील कराएं जो हमारी ज़िंदगी में रौशनी की किरण को धूमिल नहीं होने देते. तो तैयार हैं आप यादों के गलियारे में घूमनें के लिए!!!

इस बार कैसे मनाएं टीचर्स डे:
दोस्तों हमसब हर बार कुछ ना कुछ नया करने का सोचते ही हैं अपने टीचर्स के लिए इस बार इन तरीकों को अपनाकर आप अपने टीचर्स को खुश कर सकते हैं.

गिफ्ट में दे डायरी और पेन:
उन्होंने आपको पढ़ना-लिखना सिखाया और सही-गलत में फर्क सिखाया है उनके लिए पेंसिल और डायरी और पेन से अच्छा गिफ्ट कोई हो ही नहीं सकता. आप उनके पर्सनल और प्रोफेशनल यूज़ के लिए उन्हें यह गिफ्ट दे सकते हैं.

हैंडमेड कार्ड :
हैंडमेड कार्ड की तो बात ही निराली है, किसी भी मौके पर कोई भी गिफ्ट लेकर जाइए पर फिर भी जो बात हांथ से बने कार्ड में हैं वो कहीं और नहीं है.कार्ड के अंदर आप कई रंगों से अपने टीचर के लिए Poem भी लिख सकतें हैं जो यकीनन उन्हें बहुत पसंद आएगा.

बुके या फूल:

टीचर्स डे
इस टीचर्स डे पर सुबह-सुबह जब आप उन्हें फूलों का गुलदस्ता देंगे या फिर गुलाब का फूल उससे आपके टीचर के चेहरे पर जो मुस्कान आएगी वो सच में अतुलनीय होगी.

फेंगशुई गिफ्ट कर सकते हैं:
इस टीचर्स डे पर दोस्तों आप सभी अपने टीचर्स के हेल्थ और लम्बी उम्र की कामना करते है ऐसे में उन्हें फेंगशुई गिफ्ट कर सकते हैं, विंड चाइम, लाफिंग बुद्धा और भी अन्य चीजें मार्केट में उपलब्ध है.

टीचर्स डे

दोस्तों चलिए आपको कुछ ऐसे टीचर्स से मिलवातें हैं जो खुद तो मशहूर नहीं हुए लेकिन उनके हाथों तराशे गए हीरों ने देश को हमेशा गौरवान्वित किया है.

रमाकांत अचरेकर:
दोस्तों बात अगर मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की करें तो आपको बता दें कि सचिन को सचिन सचिन गूंज का आदि और इतना महान बल्लेबाज़ बनाने के पीछे उनके बचपन के कोच रमाकांत अचरेकर का बहुत बड़ा हाथ है, सचिन अपनी सफलता का श्रेय अपने कोच को देनें से कभी पीछे नहीं हटतें, सचिन कहतें है कि अचरेकर सर ने ही मुझे सिखाया कि किसी भी गेम में फिटनेस का कितना महत्व है. सचिन का मानना है कि उनकी ज़िंदगी में कोच अचरेकर ने क्रिकेट को इतना इंट्रस्टिंग गेम बनाया कि वो लगातार घंटों बिना रुके प्रैक्टिस किया करते थे.

पुलेला गोपीचंद:
भारत का प्रदर्शन इस बार ओलम्पिक खेलों में उम्दा नहीं रहा पर पीवी सिंधू ने ओलम्पिक में अच्छा प्रदर्शन किया और भारत की स्टार महिला शटलर ने रियो ओलंपिक्स 2016 में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया, ओलंपिक्स में रजत पदक जीतने वाली देश की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी हैं. लेकिन सिंधू अपनी सफलता का श्रेय कोच पुलेला गोपीचंद को देने में ज़रा भी नहीं हिचकती. सिंधू कहती हैं कि एक बेहतरीन कोच के सरे गुण कोच गोपीचंद में हैं. मैं उनसे तबसे सीखती आ रहीं हूँ जब से मैं 10 साल की थी.

आनंद एल राय:
बॉलीवुड में आनंद एल राय अपनी एक ख़ास पहचान रखते हैं. उनकी फिल्में आम लोगों के जीवन पर आधारित होती हैं, अभिनेत्री स्वरा भास्कर आनंद को इंडस्ट्री में अपना गॉडफादर मानती हैं. उनके मुताबिक बॉलीवुड में उनकी सफलता के पीछे आनंद का भी बहुत बड़ा हाथ है.

आनंद कुमार :
सुपर 30 कोचिंग के संस्थापक आनंद कुमार की कहानी से आप सब वाकिफ ही होंगे, गरीब घर के बच्चों के लिए आईआईटी जैसे संस्थान में पढ़ना सपना ही होता अगर आनंद जैसे लोग आगे नहीं आते, वंचित परिवारों के तीस बच्चों को हर साल अपनी कोचिंग में मुफ्त में आईआईटी की कोचिंग देते हैं और इतना ही नहीं इन बच्चों को अपने घर पर रखते हैं और उनकी मां बच्चों लिए भोजन बनाती हैं. आनंद ने एक अच्छे टीचर होने की मिसाल पेश की है और ये उन सभी बच्चों के लिए भगवान से काम नहीं है जिनके सपनों को इन्होंने पंख दिया है.

चाहे वो सचिन हो चाहे स्वरा या कोई और सबके जीवन में गुरुओं का बहुत बड़ा और अहम रोल रहा है, लेकिन इनमें और हम लोगों में एक फर्क है ये अपनी सफलता का श्रेय उन शिक्षकों को देने में जरा भी नहीं हिचकते और हम कभी अपने टीचर्स को स्पेशल फील कराते हैं? शायद नहीं, स्कूल कॉलेज के साथ सबकुछ ख़त्म! इस टीचर्स डे एक बार कोशिश जरूर करिएगा उनसे मिलने की बात करने की और उनके डांट और मार के पीछे छिपे प्यार को समझने की.

टीचर्स के ऊपर कितना भी बोला जाए कितना भी लिखा जाए सब कम ही है, आइए पढ़तें है कुछ कोट्स जो ये बताने की कोशिश कर रहें हैं की हमारे जीवन में शिक्षक की क्या भूमिका होती है.

  • शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें.
  • गलतियाँ भी उतनी अच्छी शिक्षक हो सकती हैं जितना की सफलता.
  • सभी कठिन कार्यों में सबसे कठिन कार्य है, एक अच्छा शिक्षक बनना.
  • एक अच्छा शिक्षक बाहर से जितना साधारण नजर आता है. अन्दर से उतना ही रोचक होता.बहुत कुछ कहा गया कहा जाता रहेगा टीचर्स के ऊपर लेकिन उनकी इम्पोर्टेंस क्या है, हमारे जीवन में सच में कोई शब्द, कोई कलम नहीं बता सकता.दोस्तों क्या अपने कभी सोचा है अपने केजी के उस टीचर के बारे में जिन्होंने आपको पेंसिल पकड़ना सिखाया, जिन्होंने आपकी दोस्ती उन शब्दों से कराई जिन शब्दों की वजह से आज आप खुद को एक्सप्रेस कर पाते हैं. उस धैर्य से शायद हम कभी किसी को पढ़ा ही नहीं सकते या कुछ बता ही नहीं सकते लेकिन हमारे टीचर्स हमारे साथ तबतक लगे रहें जबतक उन्होंने हमारी दोस्ती शब्दों से नहीं करा दी, हमारी लाइफ में कई ऐसे मौके आएं होंगे जब हमने उन्हें गलत समझा होगा, लेकिन ज़रा आज सोचिये वो सब किसलिए था? हर टीचर का ये सपना होता है कि उसके पढ़ाये हुए बच्चे जीवन में एक मुकाम हासिल करें. आपकी सफलता से आपके माता पिता और गुरु के जितना कोई खुश हो ही नहीं सकता.