सातवें दिन करें माँ कालरात्रि की उपासना

नवरात्र महापर्व में सातवां दिन मां कालरात्रि का होता है. मां कालरात्रि को विनाश और संहार की देवी माना जाता है. लेकिन मां अपने भक्तो को हमेशा शुभ फल देती है.

नवरात्र के छठे दिन करें माँ कात्यायनी की उपासना

मां कालरात्रि की कथा :
मां कालरात्रि

मां कालरात्रि ने हाहाकारी दुष्ट असुर रक्तबीज के संहार के लिए अपने तेज से मां काली को उत्पन्न किया था.
माँ का रंग काला होने के कारण इनका नाम मां कालरात्रि पड़ा. दुष्ट दानवों शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनो लोको में हाहाकार मचा दिया था.
असुरो की अति से तंग आकर देवगण भगवान शंकर के पास गए उन्होनें मां पार्वती से असुरों का संहार करने को कहा.
मां पार्वती ने भगवती दुर्गा रूप धारण कर शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध कर उन्हें पराजित किया और मौत के घाट उतार दिया लेकिन जैसे ही माँ ने रक्त बीज का वध करने की कोशिश की तभी उसके रक्त से लाखो असुर पैदा हो गये.
इस तरह माँ जब परेशान हुई तो उन्होंने मां काली को उत्पन्न किया.
जब मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार किया तो माँ काली ने रक्तबीज का सारा रक्त पी लिया और इस तरह दुष्ट दानवों का दलन हुआ.
शास्त्रों के अनुसार सप्तमी की रात सिद्धियों की रात होती है. मां भगवती का यह रूप ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाला है.
मां की कृपा से हर बाधा दूर हो जाती है.
माता की कृपा पाने के लिए उन्हें गुड़ का भोग लगाया जाता है ऐसा माना जाता है कि गुड़ मां कालरात्रि को प्रिय हैं.

सप्तमी को करे इस मंत्र का जाप:
श्लोकः या देवी सर्वभूतेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

शास्त्रों में माँ कालरात्रि को त्रिनेत्री भी कहा गया है इनके तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल हैं.
जिनसे बिजली की तरह किरणें निकलती हैं. माँ के खुले बाल बिखरे हुए रहते हैं
इनकी नासिका से श्वास और भयंकर ज्वालाएं निकलती हैं.
माँ कालरात्रि को शास्त्रों में चतुर्भुजी कहा गया है.
इनकी चार भुजाएं हैं दायीं ओर की ऊपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद देती हैं.
देवी कालरात्रि की सवारी गर्दभ (गधे) है, माँ उसपर विराजमान रहती हैं.

नवरात्र के छठे दिन करें माँ कात्यायनी की उपासना

माँ कात्यायनी का स्वरूप मां दुर्गा का छठा स्वरुप है. नवरात्रों के छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा, अर्चना की जाती है.

सातवें दिन करें माँ कालरात्रि की उपासना

कात्यान ऋषि के घर माँ ने कन्या रूप में जन्म लिया. जिसके कारण माँ कात्यायनी के नाम से विख्यात हो गयी. माँ का रूप सोने के सामान कांतिमान और चमकीला है.
चार भुजाओं वाली माँ कात्यायनी शेर पर सवार हो वरमुद्रा और अभयमुद्रा में अपने दर्शन देती हैं.
माँ के एक हाथ में कमल है तो दूसरे हाथ में तलवार है.

माँ कात्यायनी की कथा:
माँ कात्यायनी

एक वन में कत नाम के एक ऋषि रहते थे और उनका गोत्र कात्य था.महर्षि कात्य की कोई संतान नहीं थी. मां भगवती को अपनी पुत्री के रूप में पाने के लिए महर्षि कात्य ने भगवती पराम्बा की कठोर तपस्या की थी.
उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्री रत्न की प्राप्ति का वरदान दिया.
ऐसा भी माना जाता है कि माँ ने अवतार केवल महिसासुर के वध के लिए लिया था. कात्य गोत्र में जन्म लेने के कारण मां का नाम कात्यायनी पड़ गया.

माँ कात्यायनी को प्रसन्न करने का मंत्र :
इस मंत्र से जाप से माँ प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं.
चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना
कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि.

अर्थ: जिसके एक हाथ में अक्षमाला है और दूसरे हाथ में चंद्रहास की भांति दैदीप्यमान, शार्दूल अर्थात् शेर पर सवार और दानवों का विनाश करने वाली मां कात्यायनी हम सबके लिए शुभदायी हों.

भोग में शहद :
छठे दिन देवी के पूजन में मधु का महत्व बताया गया है. इस दिन प्रसाद में शहद का प्रयोग करना चाहिए. माना जाता है कि इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप को प्राप्त करता है.

शास्त्रों के अनुसार माँ कात्यायनी की उपासना करने वालों को किसी भी प्रकार का डर और भय नहीं रहता. वह मनुष्य सब तरह के पापों से मुक्त हो जाता है. शास्त्रों के वर्णन अनुसार उच्च शिक्षा का अध्ययन करने वालों को माँ की उपासना जरूर करनी चाहिए. इन्हें शोध की देवी भी कहा जाता है.

शुभ मुहूर्त में करें कलश स्थापना

कलश स्थापना!!! इस बार शारदीय नवरात्र 21 सितंबर से शुरू हो रहे हैं. इस महापर्व को शारदीय नवरात्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अश्विन माह में पड़ता है.

प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की आराधना

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रम्हचारिणी माँ की आराधना

नवरात्रों में सबसे मुख्य काम जो माना जाता है वो है माता की चौकी लगाना और कलश स्थापना. इस शारदीय नवरात्र कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 3 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा.

कलश स्थापना

नवरात्रि के इस महापर्व के दौरान दुर्गा माँ के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. व्रत  के पहले दिन घटस्थापना की जाती है.

इसके बाद भक्त नौ दिनों तक दुर्गा माँ की पूजा अर्चना करते हैं इसके बाद व्रत के अष्टमी और नवमी में कन्या पूजन होता है.

कलश स्थापना कैसे करें:
21 सितंबर को सुबह माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है. पहला दिन माँ शैलपुत्री को अर्पित किया जाता है.
सुबह कलश की स्थापना की जाती है.
कलश के ऊपर स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है किसी भी शुभ कार्य में स्वस्तिक का चिन्ह शुभ माना जाता है.
कलश में जल डालकर आम के पत्तों से उसे सजाते हैं. मौली से उसे बांधते है.
जल में बिना टूटे चावल (अक्षत) डालकर उसके ऊपर नारियल रखते है.

माता की चौकी स्थापना के लिए एक चौकी रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें. लाल रंग शुभ माना जाता है, फिर उस पर माता की मूर्ति स्थापित करें मूर्ति पर फूल और फूलों की माला इत्यादि चढ़ाएं.
कलश की स्थापना करते वक्त ध्यान रखें कि कलश माँ के मूर्ति कि दायी तरफ रखें.

माँ के नौ रूपों के नाम:
माँ के नौ रूपों के नाम
पहली शैलपुत्री कहलावें (Shailputri Mata)
दूसरी ब्रह्मचारिणी मन भावे (Brahmacharini Mata)
तीसरी चंद्रघण्टा शुभनाम (Chandrghanta Mata)
चौथी कुष्मांडा सुखधाम (Kushmanda Mata)
पांचवी देवी स्कन्दा माता (Skanda Mata)
छठी कात्यायनी विख्याता (katyayani Mata)
सातवीं कालरात्रि महामाया (Kaalratri Mata)
आठवीं महागौरी जगजाया (Mahagauri Mata)
नौवीं सिद्धिदात्री जग जाने (Siddhidatri Mata)
नव दुर्गा के नाम बखाने 

अखंड ज्योत का महत्व:
कलश स्थापना

दोस्तों अखंड ज्योत यानी लगातार जलने वाला दीपक, बिना लौ बाधित हुए जलने वाला दीपक. नवरात्रों में अखंड ज्योत का विशेष महत्व होता है.
इसे जलाने से घर में माँ जगत जननी जगदम्बिका की कृपा बनी रहती है. अखंड ज्योत का संकल्प लेने से पहले उसके विषय में कुछ नियम होते हैं और आपको इन नियमों का पालन करना ही होता हैं.
हिन्दू परंम्परा के अनुसार जिस घर में अखंड ज्योत जलती हैं उस घर के लोगों को जमीन पर सोना पड़ता हैं.
यूँ तो भगवान को याद करने के लिए हर समय उचित हैं, लेकिन मुहूर्त पर पूजन-हवन का अपना एक विशेष महत्व होता हैं कोशिश करें कि इस बार माँ की मूर्ति स्थापना और कलश स्थापना एक साथ ही करें.

Happy Navratri to All Readers!!

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रह्मचारिणी माँ की आराधना

ब्रह्मचारिणी !!! माँ दुर्गा के दूसरे स्वरुप यानी की ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा करने से मनुष्य को ज्ञान के साथ वैराग्य की भी प्राप्ति होती है. शास्‍त्रों में मां एक हर रूप की पूजा विधि और कथा का महत्‍व बताया गया है. मां आपके कठिन समय में आपको सम्बल प्रदान करती है. तो आइए जाने माँ के इस रूप के बारे में.

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा को ऐसे करे प्रसन्न, पूजा विधि, मंत्र

ब्रह्मचारिणी  मां का मंत्र:
ब्रह्मचारिणी

माँ ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र:
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा.”

माँ के नाम का अर्थ बहुत ही सीधा है ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली. माँ का यह रूप साहस और दृढ़ संकल्प के लिए माना जाता है. मां इस रूप में दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल धारण कर भक्तों को वरदान देती हैं .

मां ब्रह्मचारिणी की कथा:
माँ शैलपुत्री ने जब राजा हिमवान के घर जन्म लीं तो एक दिन महर्षि ने पार्वती को उनके पूर्व जन्म की कथा कह सुनाई.ऋषि नारद जी की बातों ने पार्वती जी के मन में शंकर जी के प्रति प्रेम भाव भर दिया. माँ पार्वती ने प्रभु शंकर को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की. इस कठिन और अडिग तपस्या के चलते ही इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया. माँ ने हज़ारों वर्ष फल-फूल खाकर अपना जीवन बिताया.

कई दिन तक कठिन उपवास रखे. माँ ने खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप जैसे तमाम मुश्किल कष्ट सहे. माँ पत्तों को खाकर अपना जीवन बिताती. एक दिन माँ ने पत्तों को भी खाना छोड़ दिया इस कारण माँ का नाम अपर्णा पड़ा.
इस अडिग तपस्या के कारण माँ ब्रह्मचारिणी का शरीर क्षीण हो गया. देवता, ऋषि-मुनि अन्य सभी लोगो ने ब्रह्मचारिणी माँ की तपस्या को अभूतपूर्व कृत्य माना और माँ के इस कृत्य की सराहना की और कहा- देवी किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की है. ये आपके द्वारा ही संभव था. आपकी मनोकामना पूरी होगी और भगवान शिव आपको पति रूप में मिलेंगे.
उन्होंने माँ पार्वती से तपस्या छोड़ घर लौट जाने को कहा और कहा आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं. मां ब्रह्मचारिणी ने तमाम दुखों को सहा लेकिन वह अडिग रही एक पल के लिए भी विचलित नहीं हुई. और आखिरकार उन्हें स्वयं महादेव पति के रूप में मिले. जीवन में कठिन संघर्षों में विचलित नहीं होना चाहिए. मां की कृपा से सभी सिद्धि प्राप्त होती है.

प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की आराधना

माँ दुर्गा के नौ रूप होते हैं. माता दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है. ये माँ के नौ स्वरूपों में उनका पहला स्वरुप है.पर्वत के राजा हिमालय के घर माँ ने पुत्री के रूप में जन्म लिया इसी कारण माँ का नाम शैलपुत्री पड़ा.
नवरात्र के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है.

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रह्मचारिणी माँ की आराधना

मां शैलपुत्री – व्रत कथा( shailputri vrat katha):
शैलपुत्री

महाराज प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ करवाया इस यज्ञ में दक्ष ने सारे देवताओं को निमंत्रित किया, लेकिन शंकर जी से विशेष ईष्या होने के कारण दक्षराज ने उन्हें इस यज्ञ में आने के लिए निमंत्रित नहीं किया. जब माता सती को यह बात पता चली कि उनके पिता विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब माँ सती वहाँ जाने के लिए विचार करने लगी. माँ ने अपनी मंशा भोलेबाबा को बताई कुछ सोचने के बाद शंकर जी ने कहा किसी कारणवश प्रजापति दक्ष ने हमे यज्ञ में नहीं बुलाया है.

यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है. देवों के यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, लेकिन हमे जान-बूझकर न्योता नहीं दिया. यज्ञ से सम्बंधित कोई सूचना भी नहीं भेजी है. ऐसे में तुम्हारा यज्ञ में बिन बुलाये जाना किसी तरीके से सही नहीं होगा. लाख समझने के बाद भी माता पारवती नहीं मणि शंकर जी ने उनका मन रखने के लिए उन्हें जाने की आज्ञा दे दी.

सती ने पिता के घर महसूस किया कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है. सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह से उन्हें गले लगाया. बहने सीधे मुँह सती से बात भी नहीं कर रही थी.
सती ने महसूस किया कि वहाँ भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है.महाराज दक्ष ने भगवान् शंकर के प्रति अपमानजनक वचन भी कहे. पति का अपमान देखकर उनका मन क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा वह अपने पति के अपमान को ना सह सकीं.

उन्होंनेअपने शरीर को यज्ञ वेदी में जलाकर भस्म कर दिया. शंकरजी ने क्रोधित होकर अपने गणों को भेज दक्ष का यज्ञ विधांश कर दिया.
माँ का जन्म हिमालय राज के घर हुआ इसलिए माँ ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं. पार्वती, हैमवती भी माँ के ही नाम हैं.

शैलपुत्री की पूजा विधि(Puja vidhi):
मां की तस्वीर को स्थापित करें और उसके नीचें चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें. अक्षत का ढेर बनाकर उस पर कलश रख दें. फिर हाथ में लाल पुष्प लेकर माता शैलपुत्री का ध्यान करें.

ध्यान मंत्र इस प्रकार है:
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:
इस मंत्र का जाप 108 बात करें.
मंत्र की संख्या पूरी हो जाने पर मां से अपनी मनोकामना व्यक्त करें.

माँ का स्रोत पाठ:
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्.

पांचवें दिन करें स्कंदमाता की पूजा

“MaaSkandamata” का दिन. आज नवरात्रि का पाँचवा दिन है. और 5th day पर माँ स्कंदा की पूजा की जाती है. भगवान स्कंद अर्थात् भगवान कार्तिकेय की माता होने के नाते इनको स्कंदमाता कहा जाता है. माता स्कंद की पूजा-अर्चना करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वयं ही हो जाती है.

नवरात्र के छठे दिन करें माँ कात्यायनी की उपासना

Because स्कंद भगवान बालक स्वरूप में हमेशा ही अपनी माता की गोद में विराजे रहते हैं. माँ के भक्त माँ के इस स्नेह भरे स्वरूप की पूजा करने से मोक्ष को पाते हैं. भगवान स्कंद को कुमार कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है और जब प्रसिद्ध देवासुर संग्राम हुआ था तो ये देवताओ के सेनापति बने थे.

स्कंदमाता स्वरूप(Form of MaaSkandamata):
स्कंदमाता

दुर्गे माँ के इस स्वरूप की चार भुजाए हैं. दोनो और के ऊपर वाले हाथों में फूल है और एक साइड के एक हाथ में अपने वत्सयानी कुमार कार्तिकेय को संभाले हुए हैं और एक हाथ से सदा अपने भक्तो को आशीर्वाद देने वाली मुद्रा में हैं.
स्कंददेवी को पद्मासाना देवी भी कहा जाता है. Because ये कमल के आसान पर विराजमान रहती हैं. सिंह भी इनकी सवारी है.

इनको गौरी, उमा और पार्वती माता के नाम से भी जाना जाता है.  कार्तिकेय माता पार्वती के ही पुत्र हैं. अंबे स्कंदमाता को अपने पुत्र कार्तिकेय से अत्यधिक प्रेम है. इसीलिए उनका ये स्वरूप अपने पुत्र को गोद में लिए हुए है.

Goddess MaaSkandamata का स्वरूप बहुत सुखदायी है. माँ की उपासना करने से बच्चो के सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और माँ के भक्तो पर माँ की कृपा बनी रहती है.

स्कंदमाता का जाप मंत्र(Mantra of MaaSkandamata):

सिंहासनगतानित्यंपदमाश्रितकार्द्वया!
शुभदासतुसदादेवीस्कंदमातायशस्विनि!!

एक और मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता!
नमस्तैस्यै नमस्तैस्यै नमस्तैस्यै नमो नम:

देवी स्कंद माता का ध्यान:
पंचमी  तिथि के दिन माँ स्कंद को केले का भोग लगाकर प्रसन्न किया जाता है और भोग लगाकर प्रसाद ब्राह्मणों को दे दिया जाता है. कहा जाता है कि ऐसा करने से मानव की बुद्धि में विकास होता है.

पूजा करके माँ के चरणो में प्रणाम करना चाहिए. संसार के दुखो से मुक्त होने का इनकी तपस्या करने से अच्छा साधन और नही है.

माँ अपने भक्तो की समस्त इच्छाओ की पूर्ति करती हैं. इस दिन साधना करने वाले साधक का मन “विशुद्धचक्र”में स्थित रहता है.

स्कंद माता की आरती:
जय तेरी हो स्कंद माता, पाँचवा नाम तुम्हाराआता
सबके मंन की जानन हारी, जग जननी सब की महतारी
तेरी ज्योत जलाती रहूं मैं, हर दम तुझको ध्याति रहूं मैं
कई नाम से तुझको पुकारा, मुझे एक है तेरा सहारा
कही पहाड़ो पर है डेरा,कई शहरो मे तेरा बसेरा
हर मंदिर मे तेरे नज़ारे, गुण गाएँ तेरे भक्त प्यारे
भक्ति अपनी मुझको दिला दो, शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो
इंदर आदि देवता मिल सारे, करे पुकार तेरे द्वारे
दुष्ट दैत्या जब आए, तूही खंडा हाथ उठाए
दासो को सदा बचाने आई, सबकी आस पूजाने आए.

चौथे दिन करें माँ कुष्मांडा की पूजा

आज नवरात्रे का चौथा दिन हैं. और 4th day पर माँ कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है. जोकि कल्याणकारी होती है. माना जाता है कि माँ कूष्मांडा मुस्कुराती रहती हैं. और अपनी धीमी-धीमी मुस्कान से ही इन्होंने ब्रह्माण्ड को उत्पन किया था. इसी लिए ब्रमांड में इनका नाम माँ कुष्मांडा पड़ा.

तीसरे दिन करें माँ चंद्रघंटा की पूजा

MaaKushmanda Form (माँ कूष्मांडा स्वरुप):

कूष्मांडा

इनके बारे में पुराणों में कहा गया है कि जब यह सृष्टि नहीं थी तब इन्ही माँ कूष्मांडा देवी ने सृष्टि की रचना की थी. इनको ब्रह्माण्ड की आदि-स्वरूपा कहा जाता है. और इनका निवास स्थान सूर्य के भीतर मध्य में है. इनका शरीर भी सूर्य देवता के सामान ही चमकता है. ये अनोखी कांतिमान हैं.
इन देवी की आठ भुजाये हैं इसलिए इनको अष्ठ भुजाधारी भी कहा जाता है. और कूष्मांडा देवी के हाथो में बाण, गदा, अमृत कलश, सर्प, फूल, चक्र, जप माला आदि  हैं. कूष्मांडा माता शेर पर सवारी करती हैं. Maa Kooshmanda के कानो  के कुंडल और सिर पर मुकुट सुशोभित होता है.

Devi kushmanda की पूजा करने से इच्छित फल मिलता है. कुष्मांडा माता के भक्त सदा आयु, यश  और धन वृद्धि को पाते हैं.

पवित्र मन से देवी कुष्मांडा की आराधना करनी चाहिए. माँ अपने भक्तो पर प्रस्सन हो जाती है और उसके सारे विघ्न समाप्त का देने का आशीर्वाद देती है.

पूजा में इस मंत्र का करे जाप:

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्मांडा रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:!!

यूँ तो हर दिन दुर्गा माता की पूजा एक सामान ही की जाती है. फर्क सिर्फ इतना है कि एक ही देवी के नौ रूप है. आप जैसे पहले दिन से पूजा कर रहे हैं वैसे ही हर दिन कर सकते हैं. मैं आपको पूजा करने का एक सीधा सा तरीका बता रही हूँ.

अपने पूजा के स्थान पर एक चौकी रखे और उस पर लाल रंग का कपडा बिछाये अगर चौकी नहीं है तो फिर लाल कपडा जमीन पर ही बिछा ले.
एक कलश स्थापित करे. कलश में गंगाजल लेकर कुछ चावल के दाने और कुछ पैसे(coin) डाल ले. अब  आम की धुली हुई पत्तियो को कलश के मुख पर सजाय फिर ऊपर से पानी वाला नारियल रखे.
ध्यान रहे नारियल का मुख हमेशा ऊपर की और ही होना चाहिए. आप चाहे तो नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर भी रख सकते हैं.
या फिर कलश के मुख पर भी लाल चुनरी बांध सकते हैं.
कलश मिटटी का या धातु का होना चाहिए. कलश पर साइड में सतिये का निशान बनाना भी शुभ माना जाता है.
माता दुर्गा के साथ बाकी देवी-देवताओ को भी मंदिर में स्थापित कर सकते हैं. फिर सब को गंगाजल से स्नान कराकर तिलक लगाया जाता है. फिर आप जो पूजा की सामग्री प्रयोग करना चाहते हैं वो कर सकते हैं.
फिर माता के सामने घी का दीपक, धूपबत्ती, अगरबत्ती जलाकर दुर्गा स्तुति और दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए. फिर सच्चे मन से माता का ध्यान करना चाहिए. फिर भोग लगाया जाता है.और माँ दुर्गा का प्रसाद बांटकर खुद भी ग्रहण किया जाता है.

यह नवरात्रो में माँ की पूजा करने का एक सरल तरीका है. इसके अलावा आप जैसे चाहे कर सकते हैं. देवी दुर्गा अपने सब बच्चो को प्यार करती है.
वैसे अधिकतर माता की पूजा में फल-फूल, चावल, कुमकुम, हल्दी, दूध, गंगाजल, पञ्च मेवे, हवन सामग्री, धूपबत्ती, अगरबत्ती, रुई की बत्ती, दीपक, घी, समिधाएं, बताशे, मिश्री, लौंग, प्रसाद भोग, पंचामृत आदि प्रयोग किया जाता है.

तीसरे दिन करें माँ चंद्रघंटा की पूजा

तीसरी शक्ति “माँ चंद्रघंटा” (Third form of Maa Chandraghanta):

विश्वकर्मा जयंती क्यों मनाई जाती है

चंद्रघंटा

चंद्रघंटा माँ की पूजा नवरात्रो के तीसरे दिन की जाती है. माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के रूप का अर्ध चंद्र है. इसी कारण इनको चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है. माता का ये रूप सुखद शांति देने वाला और मनमोहक है. माता का शरीर सोने के समान चमकदार है. माँ के गले में सफेद सुंदर फूलों की माला होती है.
माँ के दस हाथ हैं जोकि सब किसी ना किसी अश्त्र-शस्त्र से सजे हुए हैं.
माता शेर पर सवारी करती है. माता का ये रूप युद्ध के लिए हमेशा तैयार दिखता है.
ऐसा माना जाता है कि माता के घंटे की तेज और भयभीत कर देने वाली ध्वनि से असुर, अत्याचारी राक्षस और दानव सभी डरते हैं.

अगर माँ भगवती की उपासना की जाती है तो आत्मिक शांति और अध्यात्मिक शक्ति मिलती है.

इनकी आराधना सदा फलदायी होती है.

माँ के भक्त इस दिन भक्ति एवम् श्रद्धा पूर्वक पूजा-अर्चना करते है. और माँ अपने बच्चो को सदा चिरायु और सुख-संपत्ति का वरदान देती है.

कहा जाता है कि इस दिन माँ  की उपासना करके महिलाओ को अपने घर पर बुलाकर भोजन कराया जाना चाहिए. और भेट स्वरूप उन्हे मंदिर की घंटी दी जाए तो माँ की कृपा सदा भक्तो पर बनी रहती है.

माँ चंद्रघंटा की पूजा का मंत्र (Mantra of MaaChandraghanta):
पिण्डज प्रवरारूढा चंडकोपास्त्र कैर्युता
प्रसाद तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता!!

भावार्थ:  अर्थात इनके माथे पर घंटे के आकर का अर्ध चंद्र है, इनके शरीर का रंग सोने के समान चमकीला है. इनके दसो हाथो में शस्त्र आदि है. ये सिंह पर सवारी करती है. इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने वाली है. इनके घंटे की भयभीत ध्वनि से दानव दैत्य सभी डरते है.

माँ चंद्रघंटा की आरती(Aarti of MaaChandraghanta):

“नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान!
मस्तक पर है अर्ध चन्द्र, मंद मंद मुस्कान!!
दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खड़ग संग बांद!
घंटे के शब्द से हरती दुष्ट के प्राण !!
सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके स्वर्ण शरीर!
करती विपदा शांति हरे भक्त की पीर!!
मधुर वाणी को बोल कर सब को देती ज्ञान !
जितने देवी देवता सभी करें सम्मान !!
अपने शांत सवभाव से सबका करती ध्यान!
भव सागर में फँसा हूँ मैं, करो मेरा कल्याण!!
नवरात्रों की माँ, कृपा कर दो माँ!
जय माँ चंद्रघंटा, जय माँ चंद्रघंटा!!”

विश्वकर्मा जयंती क्यों मनाई जाती है

विश्वकर्मा पूजा!!!
विश्वकर्मा पूजा

विश्वकर्मा पूजा क्यों मनाते है? और विश्वकर्मा भागवान का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में आता है जिसने विश्व का निर्माण किया हो.

नवरात्र में भूल कर भी ना करें ये काम

यहां पर हम आपको विश्वकर्मा पूजा की विधि से लेकर विश्वकर्मा के जीवन से जुड़ी सभी पौराणिक और वैदिक बाते बताएंगे जो इससे पहले शायद आपको ना पता हों.
भागवान विश्वकर्मा ने ही पूरी सृष्टि का निर्माण किया है वो इस जगत के शिल्पकार हैं.
अगर आपको हिंदी के इन भरी-भरकम शब्दों को समझने में दिक्कत हो रही है तो आप इन्हें आज के हिसाब से Engineer भी कह सकते हैं.

विश्वकर्मा जयंती कब मनाई जाती है (Day of celebration):
विश्वकर्मा जयंती हर साल कन्या सक्रांति के दिन मनाई जाती है. इस साल 2017 में इसे 17 सितम्बर Sunday को मनाया जाएगा.
विश्वकर्मा पूजा सभी इंजीनियर, उपकरण और धातु बनाने वाले लोग बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं. इस दिन वो अपने औज़ार और हथियार की भी पूजा करते हैं.
पुराणों और वेदो के अनुसार भागवान विश्वकर्मा ने ही भागवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका, शंकर भागवान द्वारा रावण को भेट की गयी लंका और युधिष्ठिर की नगरी इंद्रप्रस्थ का निर्माण अपने हांथों से किया था.

विश्वकर्मा का जन्म(Birth of Vishwkarma):
विश्वकर्मा पूजा

पुराणों के अनुसार भागवान विष्णु के अवतार के वक्त उनके नाभि में ब्रम्हा जी विराजमान थे. भागवान ब्रम्हा को जगत का रचयिता कहा जाता है. ब्रम्हा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जोकि स्वयं भागवान विश्वकर्मा थे जो अपने पिता के तरह ही श्रेष्ठ शिल्पकार बने और ब्रम्हांड का निर्माण करने लगे.

विश्वकर्मा पूजा कथा (Katha of Vishwkarma Puja):
पुराने समय में एक व्यापारी था जो दिन-रात कड़ी मेहनत करता था. उसकी पत्नी भी उसके साथ बहुत मेहनत करती थी लेकिन उनके नसीब में सुख दूर-दूर तक नहीं था.
इसलिए उन्हें अमावस्या के दिन विश्वकर्मा भागवान की पूजा करने की बात किसी व्यक्ति ने बताई. उस आदमी के कहे अनुसार दोनों ने भागवान विश्वकर्मा की पूजा की उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और उनका जीवन आराम से गुजरने लगा.
इस तरह भागवान विश्वकर्म के व्रत का फल उन्हें मिला.

विश्वकर्म पूजा विधि(Vishwkarma Puja vidhi):
भागवान विश्वकर्म की पूजा उनकी मूर्ति को स्थापित करके की जाती है. पुराणों और वेदों में इनकी विभिन्न प्रकार के चित्र देखने को मिलते हैं.
सुबह नित्य कर्म के बाद ही पूजा आरम्भ करें.
हर पूजा में पत्नी का साथ होना आवश्यक है लेकिन यह पूजा में विशेष रूप से अर्धांगिनी के साथ करना चाहिए.
पत्नी के साथ मिलकर ही यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिए.
हाथ में चावल लेकर विश्कर्मा जी को स्मरण कर इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- “ॐ आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम: ओम अनन्तम नम:, पृथिव्यै नमः या ॐ श्री श्रिष्टनतया सर्वसिद्धहया विष्वकर्माया नमो नमः”

विश्वकर्मा जी की आरती(Arti of lord Vishwkarma):

जय विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा
सकल सृष्टि के करता रक्षक स्तुति धर्मा
आदि सृष्टि में विधि को श्रुति का उपदेश दिया
जीव मात्र का जग में विकास किया
ऋषि अंगिरा तप से शांति नहीं पायी
रोग ग्रस्त राजा ने जब आश्रय लीना
संकट मोचन बनकर दुःख दूर कीना
जय विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा
जब रथकार दम्पति तुम्हारी तेर करी
सुनकर दीन प्रार्थना विपत हरी सगरी
एकानन, चतुरानन पंचानन राजे
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज सकल रूप साजे
ध्यान धरे तब पद का सकल सिद्धि आवे
मन दुविधा मिट जावे सकल सिद्धि पावे
मन दुविधा मिट जावे अटल शक्ति पावे
श्री विश्वकर्मा जी की आरती जो कोई नर गावे
भजत गजानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे.

इस नवरात्र इन Dishes को Try करें

FAST DISH!!! दोस्तों किसी भी व्रत में सबसे बड़ी मुश्किल होती है कि व्रत के डिश क्या बनाएं व्रत में आप कोई ऐसी चीज बनाना चाहतें हैं जो आसानी और जल्दी से बन जाए तो दोस्तों आपके लिए तैयार है जल्दी और आसानी से बन जाने वाले व्रत के Recipes की list.

इस नवरात्र डोली चढ़कर आएंगी मां

फ्राई आलू (Fried Potato):FAST DISH

FAST DISH में पहला नंबर है फ्राई आलू का इनकों बनाने में ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं लगती. अगर छोटे आलू हों तो आलू साबुत ही फ्राई किये जा सकते हैं, और अगर आलू बड़े बड़े हैं तो उनके 4 या 5 टुकड़े कर के फ्राई किये जा सकते हैं.

विधि:
6-7 मीडियम आकार के आलू अच्छी तरह धोकर उबाल ठंडा कीजिये, छील लीजिये.तेल कढ़ाई में डाल कर गरम कीजिये, गरम तेल में आलू डाल कर हल्के  ब्राउन होने तक तल कर प्लेट में निकाल लीजिये.एक table spoon oil बचाकर,बाकी तेल निकाल दीजिये. तेल में जीरा डालिये, जीरा तड़कने के बाद आलू, नमक और आधा छोटी चम्मच काली मिर्च डाल कर आलू 2-3 मिनिट तक भूनिये, गैस बन्द कर दीजिये, हरा धनियां और एक नीबू का रस डाल कर मिलाइये. लीजिये व्रत के लिये आलू तैयार हैं, स्वादिष्ट आलू खाइये.

फलों का रायता (Fruit Raita):FAST DISH

FAST DISH में हमारी दूसरी रेसिपी है, रायता दोस्तों कभी-कभी हमारा मन व्रत के दौरान फल खाने का बिलकुल भी नहीं होता है. लेकिन उन्हीं फलों से बनें Dishes हमें पसंद आती है. दोस्तों व्रत के समय फलों का रायता बनाइये, यह बड़ा ही tasty और refreshing करने वाला होता है. फलों का रायता अगर खाने के साथ है तो सच में खाने का स्वाद और पाचन दोनों ही बढ़ जायेंगे.

सामाग्री:
दोस्तों सामाग्री आप अपने हिसाब से ले सकतें हैं कितने लोगों के लिए रायता तैयार कर रहे हैं उसका ध्यान रखते हुए और फलों की जगह आप अपने पसंदीदा फल ले सकतें हैं.

केला (मोटे गोल टुकड़े में काट लीजिये)•
सेब  ( छील कर छोटे छोटे टुकड़े में काट लीजिये)•
अंगूर  (डंठल तोड़ लीजिये)•
खरबूजा –  1 कप ( छोटे छोटे टुकड़े कटे हुये)

2 कप दही को 100 ग्राम मलाई और 2 -3 table spoon चीनी मिलाकर mix कर लीजिये. सारे कटे फल दही में मिलाइये. इलायची छील कर बारीक कूट लीजिये और फिर उसे रायते में मिला दीजिये. रायते को ठंडा होने के लिये फ्रिज में रख दीजिये.फलों का रायता तैयार है, ठंडा खुशबूदार रायता परोसिये.

लौकी की बर्फी :FAST DISH

व्रत के डिश! दोस्तों लौकी से बनी सब्जी तो आप सभी ने खाई ही होगी पर क्या लौकी से बनी मिठाई का स्वाद आपने चखा है, अगर नहीं तो हम आपके लिए लौकी से बनने वाली बर्फी लेकर आए हैं. आप इस बर्फी को किसी भी खास मौके या त्यौहार के समय बना कर सबका मन जीत सकते हैं. लौकी की बर्फी आप कई तरीके से बना सकते है. लौकी को दूध में पका कर, मावा के साथ मिलाकर बना सकते हैं हर तरह से बनी लौकी की बर्फी का अपना अलग स्वाद होता है.

विधि:
लौकी अच्छे से धोकर छील लीजिये, और टुकड़ों में Cut करिए, बीज और अन्दर का बीज वाला गूदा हटा दीजिये. आप लौकी को कद्दूकस भी कर सकते हैं.लौकी के टुकड़ों कद्दूकस कर लीजिए.
कद्दूकस की हुई लौकी को निचोड़ कर जूस हटा कर इसे कढा़ई में डाल दीजिए.
बादाम और काजू को 7-8 टुकड़े काट लीजिए. इलायची को छीलकर इसके बीजों का पाउडर बना लीजिए,मावा को क्रम्बल कर लीजिए,थाली में जरा सा घी लगाकर चिकना कीजिये.
कढ़ाई में लौकी पहले से ही डाल रखी है अब इसमें 2 छोटी चम्मच घी डाल दीजिये, ढककर धीमी आग पर पकने रख दीजिये, थोड़ी-थोडी़ देर में चमचे से चलाइये और फिर से ढक दीजिये. लौकी को नरम होने तक पकने दीजिये.
लौकी में चीनी डालकर पकाइये, बीच बीच में हर -2 मिनिट में इसे Check करते हुए पकाएं.
लौकी से पानी बिल्कुल सूख जाने तक लौकी को पका लीजिये.
जूस के सूख जाने पर पकी हुई लौकी में बचा हुआ घी डालिये और लौकी को अच्छी तरह भून लीजिये. भुने लौकी चीनी में मावा मिलाइये और चमचे से चलाते हुये तब तक पकाइये जब तक कि वह जमने वाली अवस्था में न हो.
लौकी में कटे हुए काजू डालकर mix कीजिए. Mixture की सतता Check करने के लिए चाशनी को उँगलियों से चिपका कर देखें  को चिपका कर देखिये कि वह उंगलियों से चिपकते हुये जमने सा लगता है तो आपकी बर्फी बनकर तैयार है.
बर्फी का mixture तैयार हो जाने पर इसमें इलायची Powder डाल कर Mix कर दीजिए. बर्फी बनकर तैयार है.
मिश्रण को घी लगी थाली में डालकर जमने रख दीजिये.बर्फी के ऊपर बारीक पिस्ते डाल कर चिपका दीजिये.
बर्फी जमकर तैयार हो जाती है. लौकी की बर्फी को आप अपने मन पसन्द आकार में काटिये.

फ्रेंच फ्राइज:

FAST DISH
FAST DISH में अब number है फ्रेंच फ्राइज का, दोस्तों अगर व्रत के दौरान अपनी फेवरेट Crispy फ्रेंच फ्राइज नहीं खा पाते तो Tension लेने की कोई जरूरत नहीं है हम बता रहे हैं व्रत वाले फ्रेंच फ्राइज बनाने का आसान तरीका.

दोस्तों व्रत वाले फ्रेंच फ्राइज़ के लिए आप लोगों की संख्या के अनुसार 5-6 आलू ले लीजिये
आधा बड़ा चम्मच काली मिर्च पाउडर और आधा बड़ा चम्मच अमचूर और आधा बड़ा चम्मच गरम मसाला ले लीजिये तलने के लिए शुद्ध घी और नमक अपने स्वादानुसार लें.
दोस्तों आलूओं को छीलकर लंबे-लंबे पतले चौकोर स्लाइस में काट लें. इन टुकड़ों को बर्फ वाले पानी में डालकर आधा घंटे तक रहने दें. फिर कुछ समय बाद आलूओं से पानी निचोड़कर निकाल दें और एक सूती कपड़े पर फैला लें. ऐसा करने से इनका पानी अच्छी तरह सूख जाएगा.
इसके बाद फिर इन पर कॉर्नफ्लोर मिला लें.कड़ाही में घी डालकर तेज आंच पर गरम होने के लिए रखें. दोस्तों जब तेल गरम हो जाए तो इसमे आलू के टुकड़ों को डालकर चलाते हुए Deep fry करें.
एक बड़े plate पर french fries रखें और इन पर सभी मसाले व सेंधा नमक छिड़ककर अच्छी तरह मिला लें. लीजिये दोस्तों हो गए आपके व्रत वाले फ्रेंच फ्राइज़

नारियल के लड्डू:FAST DISH

FAST DISH में अब बारी है नारियल के लड्डू की ,दोस्तों नारियल के लड्डू व्रत में खाने के लिए बहुत अच्छा Option है. इसको बनाना भी आसान है. आप इसको लम्बे समय तक रख सकतें हैं .
दोस्तों नारियल के लड्डू के लिए नारियल का बुरादा लें इसके साथ ही मावा और चीनी लें. लड्डू के लिए इलायची powder और बादाम के टुकड़े लें.
नारियल के बुरादे में चीनी और एक कप पानी मिला के आधे घंटे के लिए रख दें. कढ़ाई में नारियल के मिश्रण को  डालकर धीमीं आंच पर चलाएं. जब Mixture चिचिपा हो जाएं तो खोया और इलायची पाउडर mix कर 2 से 3 मिनट तक चलाएं फिर गैस बंद कर दें. फिर गोल Size देकर उसपर बादाम चिपका दें .