मां सिद्धिदात्री के पूजन से समाप्त होता है नवरात्र

नवरात्र महापर्व के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा और उपासना की जाती है. मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं.

दशहरा पर भगवान राम और मां दुर्गा से लें सीख

मां सिद्धिदात्री

ऐसा माना जाता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा पूरे विधि-विधान के साथ करने वाले मनुष्यों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
मां के चार हाथ हैं और मां सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर विराजमान हैं.
मां के दाहिंनी हाथ में चक्र है ऊपर वाले हाथ में गदा है. दूसरे हाथ में कमल का फूल और शंख है. प्राचीन पुराणों में शास्त्रों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और वशित्व नामक आठ सिद्धियां बताई गई हैं.
भक्तों को ये आठों सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की पूजा और उपासना करने से मिल सकती है.
हनुमान चालीसा में भी इन्हीं आठ सिद्धियों का उल्लेख है कि ‘अष्टसिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन्ह जानकी माता’ यहां ऊपर दिए गए आठों सिद्धियों की बात की गयी है.
शास्त्रों के अनुसार स्वयं भगवान शंकर ने भी मां सिद्धिदात्री देवी की कठोर तपस्या कर मां से ये आठ सिद्धियां प्राप्त की थीं.
मां की कृपा से ही खुद सिद्धिदात्री महादेव की आधी देह हो गयीं और भोलेनाथ अर्द्धनारीश्वर कहलाए.
नौवें दिन इनकी पूजा के बाद ही नवरात्र का समापन माना जाता है.
इस दिन ही हिंदू परिवारों में कन्याओं का पूजन किया जाता है.

मां सिद्धदाद्धत्री स्तुति मंत्र:
सिद्धगन्‍धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी

देवी का बीज मंत्र:
ऊॅं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नमः
ऊपर दिए गए श्लोक के अलावा भी मां सिद्धिदात्री की पूजा में दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोकों का प्रयोग किया जा सकता है.

कन्या पूजन :
नवरात्र के नवें दिन नौ कन्याओं को घर में भोजन कराना चाहिए. नव-देवियों में मां सिद्धिदात्री आखिरी हैं. मां की पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.
जिन कन्याओं को आप कन्या भोज करा रहे हैं उन कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर और 10 वर्ष तक होनी चाहिए.
यदि 9 से ज्यादा कन्या आपके घर भोजन करने आ रही हैं तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.

आठवें दिन करें मां महागौरी की उपासना

नवरात्री महापर्व के आठवें दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा उपासना की जाती है. मां महागौरी की उपासना मनुष्य के भीतर पल रहे कुत्सित व बुरे विचारों को ख़त्म कर ज्ञान की ज्योति जलाती हैं.

मां सिद्धिदात्री के पूजन से समाप्त होता है नवरात्र

मां महागौरी

मां का ध्यान करने से मनुष्य को आत्मिक शांति मिलती है.उसके अंदर श्रद्धा, निष्ठा आदि का विकास होता है.
मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का स्वरूप महागौरी है.
जिनकी आराधना से उनके भक्तों को सही राह मिलती है.
इस दिन व्रत रखकर मां का पूजन करें और फिर मां को भोग लगाएं, उसके बाद भोग लगे हुआ मां का प्रसाद ग्रहण करे.

अष्टमी कथा:
नवरात्र के आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है. अष्टमी के दिन मां को याद करने व उनकी स्तुति से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है.
पौराणिक कथाओं और शास्त्रों के अनुसार मां महागौरी ने घोर तप कर गौरवर्ण प्राप्त किया था.
जब माता की उत्पत्ति हुई थी तो ऐसा माना जाता है कि उनकी आयु आठ वर्ष की थी.इसी कारण मां की पूजा अर्चना अष्टमी को किया जाता है.
अष्टमी के ही दिन कन्याओं के पूजन का विधान है. मां धन वैभव, सुख, संपदा, खुशहाली और शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं.
मां वृषभवाहिनी अर्थात बैल की सवारी करती हैं.
शास्त्रों के अनुसार मां महागौरी ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी.
जिसके बाद उनका शरीर मिटटी के ढेर से ढक गया था.
भगवान शंकर मां महागौरी पर प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का आर्शीवाद दिया.
भगवान शंकर ने मां महागौरी के शरीर को गंगाजल से स्नान कराया जिसके बाद मां महागौरी का शरीर गोरा और दैदीप्यमान हो गया.
इसी कारण मां का नाम महागौरी पड़ा.
मां महागौरी गीत- संगीत से प्रसन्न होती है. मां के पूजा और उपासना में संगीत अवश्य होता है.
हिन्दू धर्म में अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन कराए जाने और सामर्थ्य के अनुसार दान किये जाने की परम्परा है.

ध्यान मंत्र:
श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेतांबरधरा शुचि
महागौरी शुभे दद्यान्महादेव प्रमोददा.

सातवें दिन करें माँ कालरात्रि की उपासना

नवरात्र महापर्व में सातवां दिन मां कालरात्रि का होता है. मां कालरात्रि को विनाश और संहार की देवी माना जाता है. लेकिन मां अपने भक्तो को हमेशा शुभ फल देती है.

नवरात्र के छठे दिन करें माँ कात्यायनी की उपासना

मां कालरात्रि की कथा :
मां कालरात्रि

मां कालरात्रि ने हाहाकारी दुष्ट असुर रक्तबीज के संहार के लिए अपने तेज से मां काली को उत्पन्न किया था.
माँ का रंग काला होने के कारण इनका नाम मां कालरात्रि पड़ा. दुष्ट दानवों शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनो लोको में हाहाकार मचा दिया था.
असुरो की अति से तंग आकर देवगण भगवान शंकर के पास गए उन्होनें मां पार्वती से असुरों का संहार करने को कहा.
मां पार्वती ने भगवती दुर्गा रूप धारण कर शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध कर उन्हें पराजित किया और मौत के घाट उतार दिया लेकिन जैसे ही माँ ने रक्त बीज का वध करने की कोशिश की तभी उसके रक्त से लाखो असुर पैदा हो गये.
इस तरह माँ जब परेशान हुई तो उन्होंने मां काली को उत्पन्न किया.
जब मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार किया तो माँ काली ने रक्तबीज का सारा रक्त पी लिया और इस तरह दुष्ट दानवों का दलन हुआ.
शास्त्रों के अनुसार सप्तमी की रात सिद्धियों की रात होती है. मां भगवती का यह रूप ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाला है.
मां की कृपा से हर बाधा दूर हो जाती है.
माता की कृपा पाने के लिए उन्हें गुड़ का भोग लगाया जाता है ऐसा माना जाता है कि गुड़ मां कालरात्रि को प्रिय हैं.

सप्तमी को करे इस मंत्र का जाप:
श्लोकः या देवी सर्वभूतेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

शास्त्रों में माँ कालरात्रि को त्रिनेत्री भी कहा गया है इनके तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल हैं.
जिनसे बिजली की तरह किरणें निकलती हैं. माँ के खुले बाल बिखरे हुए रहते हैं
इनकी नासिका से श्वास और भयंकर ज्वालाएं निकलती हैं.
माँ कालरात्रि को शास्त्रों में चतुर्भुजी कहा गया है.
इनकी चार भुजाएं हैं दायीं ओर की ऊपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद देती हैं.
देवी कालरात्रि की सवारी गर्दभ (गधे) है, माँ उसपर विराजमान रहती हैं.

नवरात्र के छठे दिन करें माँ कात्यायनी की उपासना

माँ कात्यायनी का स्वरूप मां दुर्गा का छठा स्वरुप है. नवरात्रों के छठे दिन माँ  कात्यायनी की पूजा, अर्चना की जाती है.

शुभ मुहूर्त में करें कलश स्थापना

कात्यान ऋषि के घर माँ ने कन्या रूप में जन्म लिया जिसके कारण माँ कात्यायनी के नाम से विख्यात हो गयी. माँ का रूप सोने के सामान कांतिमान और चमकीला है.
चार भुजाओं वाली माँ कात्यायनी शेर पर सवार हो वरमुद्रा और अभयमुद्रा में अपने दर्शन देती हैं.
माँ के एक हाथ में कमल है तो दूसरे हाथ में तलवार है.

माँ कात्यायनी की कथा:
माँ कात्यायनी

एक वन में कत नाम के एक ऋषि रहते थे और उनका गोत्र कात्य था.महर्षि कात्य की कोई संतान नहीं थी. मां भगवती को अपनी पुत्री के रूप में पाने के लिए महर्षि कात्य ने भगवती पराम्बा की कठोर तपस्या की थी.
उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्री रत्न की प्राप्ति का वरदान दिया.
ऐसा भी माना जाता है कि माँ ने अवतार केवल महिसासुर के वध के लिए लिया था. कात्य गोत्र में जन्म लेने के कारण मां का नाम कात्यायनी पड़ गया.

माँ कात्यायनी को प्रसन्न करने का मंत्र :
इस मंत्र से जाप से माँ प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं.
चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना
कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि.

अर्थ: जिसके एक हाथ में अक्षमाला है और दूसरे हाथ में चंद्रहास की भांति दैदीप्यमान, शार्दूल अर्थात् शेर पर सवार और दानवों का विनाश करने वाली मां कात्यायनी हम सबके लिए शुभदायी हों.

भोग में शहद :
छठे दिन देवी के पूजन में मधु का महत्व बताया गया है. इस दिन प्रसाद में शहद का प्रयोग करना चाहिए. माना जाता है कि इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप को प्राप्त करता है.

शास्त्रों के अनुसार माँ कात्यायनी की उपासना करने वालों को किसी भी प्रकार का डर और भय नहीं रहता. वह मनुष्य सब तरह के पापों से मुक्त हो जाता है. शास्त्रों के वर्णन अनुसार उच्च शिक्षा का अध्ययन करने वालों को माँ की उपासना जरूर करनी चाहिए. इन्हें शोध की देवी भी कहा जाता है.

शुभ मुहूर्त में करें कलश स्थापना

कलश स्थापना!!! इस बार शारदीय नवरात्र 21 सितंबर से शुरू हो रहे हैं. इस महापर्व को शारदीय नवरात्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अश्विन माह में पड़ता है.

प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की आराधना

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रम्हचारिणी माँ की आराधना

नवरात्रों में सबसे मुख्य काम जो माना जाता है वो है माता की चौकी लगाना और कलश स्थापना. इस शारदीय नवरात्र कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 3 मिनट से 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा.

कलश स्थापना

नवरात्रि के इस महापर्व के दौरान दुर्गा माँ के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है. व्रत  के पहले दिन घटस्थापना की जाती है.

इसके बाद भक्त नौ दिनों तक दुर्गा माँ की पूजा अर्चना करते हैं इसके बाद व्रत के अष्टमी और नवमी में कन्या पूजन होता है.

कलश स्थापना कैसे करें:
21 सितंबर को सुबह माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है. पहला दिन माँ शैलपुत्री को अर्पित किया जाता है.
सुबह कलश की स्थापना की जाती है.
कलश के ऊपर स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है किसी भी शुभ कार्य में स्वस्तिक का चिन्ह शुभ माना जाता है.
कलश में जल डालकर आम के पत्तों से उसे सजाते हैं. मौली से उसे बांधते है.
जल में बिना टूटे चावल (अक्षत) डालकर उसके ऊपर नारियल रखते है.

माता की चौकी स्थापना के लिए एक चौकी रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें. लाल रंग शुभ माना जाता है, फिर उस पर माता की मूर्ति स्थापित करें मूर्ति पर फूल और फूलों की माला इत्यादि चढ़ाएं.
कलश की स्थापना करते वक्त ध्यान रखें कि कलश माँ के मूर्ति कि दायी तरफ रखें.

माँ के नौ रूपों के नाम:
माँ के नौ रूपों के नाम
पहली शैलपुत्री कहलावें (Shailputri Mata)
दूसरी ब्रह्मचारिणी मन भावे (Brahmacharini Mata)
तीसरी चंद्रघण्टा शुभनाम (Chandrghanta Mata)
चौथी कुष्मांडा सुखधाम (Kushmanda Mata)
पांचवी देवी स्कन्दा माता (Skanda Mata)
छठी कात्यायनी विख्याता (katyayani Mata)
सातवीं कालरात्रि महामाया (Kaalratri Mata)
आठवीं महागौरी जगजाया (Mahagauri Mata)
नौवीं सिद्धिदात्री जग जाने (Siddhidatri Mata)
नव दुर्गा के नाम बखाने 

अखंड ज्योत का महत्व:
कलश स्थापना

दोस्तों अखंड ज्योत यानी लगातार जलने वाला दीपक, बिना लौ बाधित हुए जलने वाला दीपक. नवरात्रों में अखंड ज्योत का विशेष महत्व होता है.
इसे जलाने से घर में माँ जगत जननी जगदम्बिका की कृपा बनी रहती है. अखंड ज्योत का संकल्प लेने से पहले उसके विषय में कुछ नियम होते हैं और आपको इन नियमों का पालन करना ही होता हैं.
हिन्दू परंम्परा के अनुसार जिस घर में अखंड ज्योत जलती हैं उस घर के लोगों को जमीन पर सोना पड़ता हैं.
यूँ तो भगवान को याद करने के लिए हर समय उचित हैं, लेकिन मुहूर्त पर पूजन-हवन का अपना एक विशेष महत्व होता हैं कोशिश करें कि इस बार माँ की मूर्ति स्थापना और कलश स्थापना एक साथ ही करें.

Happy Navratri to All Readers!!

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रह्मचारिणी माँ की आराधना

ब्रह्मचारिणी !!! माँ दुर्गा के दूसरे स्वरुप यानी की ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा करने से मनुष्य को ज्ञान के साथ वैराग्य की भी प्राप्ति होती है. शास्‍त्रों में मां एक हर रूप की पूजा विधि और कथा का महत्‍व बताया गया है. मां आपके कठिन समय में आपको सम्बल प्रदान करती है. तो आइए जाने माँ के इस रूप के बारे में.

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा को ऐसे करे प्रसन्न, पूजा विधि, मंत्र

ब्रह्मचारिणी  मां का मंत्र:
ब्रह्मचारिणी

माँ ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र:
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा.”

माँ के नाम का अर्थ बहुत ही सीधा है ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली. माँ का यह रूप साहस और दृढ़ संकल्प के लिए माना जाता है. मां इस रूप में दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल धारण कर भक्तों को वरदान देती हैं .

मां ब्रह्मचारिणी की कथा:
माँ शैलपुत्री ने जब राजा हिमवान के घर जन्म लीं तो एक दिन महर्षि ने पार्वती को उनके पूर्व जन्म की कथा कह सुनाई.ऋषि नारद जी की बातों ने पार्वती जी के मन में शंकर जी के प्रति प्रेम भाव भर दिया. माँ पार्वती ने प्रभु शंकर को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की. इस कठिन और अडिग तपस्या के चलते ही इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया. माँ ने हज़ारों वर्ष फल-फूल खाकर अपना जीवन बिताया.

कई दिन तक कठिन उपवास रखे. माँ ने खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप जैसे तमाम मुश्किल कष्ट सहे. माँ पत्तों को खाकर अपना जीवन बिताती. एक दिन माँ ने पत्तों को भी खाना छोड़ दिया इस कारण माँ का नाम अपर्णा पड़ा.
इस अडिग तपस्या के कारण माँ ब्रह्मचारिणी का शरीर क्षीण हो गया. देवता, ऋषि-मुनि अन्य सभी लोगो ने ब्रह्मचारिणी माँ की तपस्या को अभूतपूर्व कृत्य माना और माँ के इस कृत्य की सराहना की और कहा- देवी किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की है. ये आपके द्वारा ही संभव था. आपकी मनोकामना पूरी होगी और भगवान शिव आपको पति रूप में मिलेंगे.
उन्होंने माँ पार्वती से तपस्या छोड़ घर लौट जाने को कहा और कहा आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं. मां ब्रह्मचारिणी ने तमाम दुखों को सहा लेकिन वह अडिग रही एक पल के लिए भी विचलित नहीं हुई. और आखिरकार उन्हें स्वयं महादेव पति के रूप में मिले. जीवन में कठिन संघर्षों में विचलित नहीं होना चाहिए. मां की कृपा से सभी सिद्धि प्राप्त होती है.

प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की आराधना

माँ दुर्गा के नौ रूप होते हैं. माता दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है. ये माँ के नौ स्वरूपों में उनका पहला स्वरुप है.पर्वत के राजा हिमालय के घर माँ ने पुत्री के रूप में जन्म लिया इसी कारण माँ का नाम शैलपुत्री पड़ा.
नवरात्र के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है.

नवरात्र के दूसरे दिन करें ब्रह्मचारिणी माँ की आराधना

मां शैलपुत्री – व्रत कथा( shailputri vrat katha):
शैलपुत्री

महाराज प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ करवाया इस यज्ञ में दक्ष ने सारे देवताओं को निमंत्रित किया, लेकिन शंकर जी से विशेष ईष्या होने के कारण दक्षराज ने उन्हें इस यज्ञ में आने के लिए निमंत्रित नहीं किया. जब माता सती को यह बात पता चली कि उनके पिता विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब माँ सती वहाँ जाने के लिए विचार करने लगी. माँ ने अपनी मंशा भोलेबाबा को बताई कुछ सोचने के बाद शंकर जी ने कहा किसी कारणवश प्रजापति दक्ष ने हमे यज्ञ में नहीं बुलाया है.

यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है. देवों के यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, लेकिन हमे जान-बूझकर न्योता नहीं दिया. यज्ञ से सम्बंधित कोई सूचना भी नहीं भेजी है. ऐसे में तुम्हारा यज्ञ में बिन बुलाये जाना किसी तरीके से सही नहीं होगा. लाख समझने के बाद भी माता पारवती नहीं मणि शंकर जी ने उनका मन रखने के लिए उन्हें जाने की आज्ञा दे दी.

सती ने पिता के घर महसूस किया कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है. सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह से उन्हें गले लगाया. बहने सीधे मुँह सती से बात भी नहीं कर रही थी.
सती ने महसूस किया कि वहाँ भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है.महाराज दक्ष ने भगवान् शंकर के प्रति अपमानजनक वचन भी कहे. पति का अपमान देखकर उनका मन क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा वह अपने पति के अपमान को ना सह सकीं.

उन्होंनेअपने शरीर को यज्ञ वेदी में जलाकर भस्म कर दिया. शंकरजी ने क्रोधित होकर अपने गणों को भेज दक्ष का यज्ञ विधांश कर दिया.
माँ का जन्म हिमालय राज के घर हुआ इसलिए माँ ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं. पार्वती, हैमवती भी माँ के ही नाम हैं.

शैलपुत्री की पूजा विधि(Puja vidhi):
मां की तस्वीर को स्थापित करें और उसके नीचें चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें. अक्षत का ढेर बनाकर उस पर कलश रख दें. फिर हाथ में लाल पुष्प लेकर माता शैलपुत्री का ध्यान करें.

ध्यान मंत्र इस प्रकार है:
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:
इस मंत्र का जाप 108 बात करें.
मंत्र की संख्या पूरी हो जाने पर मां से अपनी मनोकामना व्यक्त करें.

माँ का स्रोत पाठ:
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्.

पांचवें दिन करें स्कंदमाता की पूजा

“MaaSkandamata” का दिन. आज नवरात्रि का पाँचवा दिन है. और 5th day पर माँ स्कंदा की पूजा की जाती है. भगवान स्कंद अर्थात् भगवान कार्तिकेय की माता होने के नाते इनको स्कंदमाता कहा जाता है. माता स्कंद की पूजा-अर्चना करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वयं ही हो जाती है.

चौथे दिन करें माँ कुष्मांडा की पूजा

Because स्कंद भगवान बालक स्वरूप में हमेशा ही अपनी माता की गोद में विराजे रहते हैं. माँ के भक्त माँ के इस स्नेह भरे स्वरूप की पूजा करने से मोक्ष को पाते हैं. भगवान स्कंद को कुमार कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है और जब प्रसिद्ध देवासुर संग्राम हुआ था तो ये देवताओ के सेनापति बने थे.

स्कंदमाता स्वरूप(Form of MaaSkandamata):
स्कंदमाता

दुर्गे माँ के इस स्वरूप की चार भुजाए हैं. दोनो और के ऊपर वाले हाथों में फूल है और एक साइड के एक हाथ में अपने वत्सयानी कुमार कार्तिकेय को संभाले हुए हैं और एक हाथ से सदा अपने भक्तो को आशीर्वाद देने वाली मुद्रा में हैं.
स्कंददेवी को पद्मासाना देवी भी कहा जाता है. Because ये कमल के आसान पर विराजमान रहती हैं. सिंह भी इनकी सवारी है.

इनको गौरी, उमा और पार्वती माता के नाम से भी जाना जाता है.  कार्तिकेय माता पार्वती के ही पुत्र हैं. अंबे स्कंदमाता को अपने पुत्र कार्तिकेय से अत्यधिक प्रेम है. इसीलिए उनका ये स्वरूप अपने पुत्र को गोद में लिए हुए है.

Goddess MaaSkandamata का स्वरूप बहुत सुखदायी है. माँ की उपासना करने से बच्चो के सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और माँ के भक्तो पर माँ की कृपा बनी रहती है.

स्कंदमाता का जाप मंत्र(Mantra of MaaSkandamata):

सिंहासनगतानित्यंपदमाश्रितकार्द्वया!
शुभदासतुसदादेवीस्कंदमातायशस्विनि!!

एक और मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता!
नमस्तैस्यै नमस्तैस्यै नमस्तैस्यै नमो नम:

देवी स्कंद माता का ध्यान:
पंचमी  तिथि के दिन माँ स्कंद को केले का भोग लगाकर प्रसन्न किया जाता है और भोग लगाकर प्रसाद ब्राह्मणों को दे दिया जाता है. कहा जाता है कि ऐसा करने से मानव की बुद्धि में विकास होता है.

पूजा करके माँ के चरणो में प्रणाम करना चाहिए. संसार के दुखो से मुक्त होने का इनकी तपस्या करने से अच्छा साधन और नही है.

माँ अपने भक्तो की समस्त इच्छाओ की पूर्ति करती हैं. इस दिन साधना करने वाले साधक का मन “विशुद्धचक्र”में स्थित रहता है.

स्कंद माता की आरती:
जय तेरी हो स्कंद माता, पाँचवा नाम तुम्हाराआता
सबके मंन की जानन हारी, जग जननी सब की महतारी
तेरी ज्योत जलाती रहूं मैं, हर दम तुझको ध्याति रहूं मैं
कई नाम से तुझको पुकारा, मुझे एक है तेरा सहारा
कही पहाड़ो पर है डेरा,कई शहरो मे तेरा बसेरा
हर मंदिर मे तेरे नज़ारे, गुण गाएँ तेरे भक्त प्यारे
भक्ति अपनी मुझको दिला दो, शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो
इंदर आदि देवता मिल सारे, करे पुकार तेरे द्वारे
दुष्ट दैत्या जब आए, तूही खंडा हाथ उठाए
दासो को सदा बचाने आई, सबकी आस पूजाने आए.

चौथे दिन करें माँ कुष्मांडा की पूजा

आज नवरात्रे का चौथा दिन हैं. और 4th day पर माँ कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है. जोकि कल्याणकारी होती है. माना जाता है कि माँ कूष्मांडा मुस्कुराती रहती हैं. और अपनी धीमी-धीमी मुस्कान से ही इन्होंने ब्रह्माण्ड को उत्पन किया था. इसी लिए ब्रमांड में इनका नाम माँ कुष्मांडा पड़ा.

तीसरे दिन करें माँ चंद्रघंटा की पूजा

MaaKushmanda Form (माँ कूष्मांडा स्वरुप):

कूष्मांडा

इनके बारे में पुराणों में कहा गया है कि जब यह सृष्टि नहीं थी तब इन्ही माँ कूष्मांडा देवी ने सृष्टि की रचना की थी. इनको ब्रह्माण्ड की आदि-स्वरूपा कहा जाता है. और इनका निवास स्थान सूर्य के भीतर मध्य में है. इनका शरीर भी सूर्य देवता के सामान ही चमकता है. ये अनोखी कांतिमान हैं.
इन देवी की आठ भुजाये हैं इसलिए इनको अष्ठ भुजाधारी भी कहा जाता है. और कूष्मांडा देवी के हाथो में बाण, गदा, अमृत कलश, सर्प, फूल, चक्र, जप माला आदि  हैं. कूष्मांडा माता शेर पर सवारी करती हैं. Maa Kooshmanda के कानो  के कुंडल और सिर पर मुकुट सुशोभित होता है.

Devi kushmanda की पूजा करने से इच्छित फल मिलता है. कुष्मांडा माता के भक्त सदा आयु, यश  और धन वृद्धि को पाते हैं.

पवित्र मन से देवी कुष्मांडा की आराधना करनी चाहिए. माँ अपने भक्तो पर प्रस्सन हो जाती है और उसके सारे विघ्न समाप्त का देने का आशीर्वाद देती है.

पूजा में इस मंत्र का करे जाप:

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्मांडा रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:!!

यूँ तो हर दिन दुर्गा माता की पूजा एक सामान ही की जाती है. फर्क सिर्फ इतना है कि एक ही देवी के नौ रूप है. आप जैसे पहले दिन से पूजा कर रहे हैं वैसे ही हर दिन कर सकते हैं. मैं आपको पूजा करने का एक सीधा सा तरीका बता रही हूँ.

अपने पूजा के स्थान पर एक चौकी रखे और उस पर लाल रंग का कपडा बिछाये अगर चौकी नहीं है तो फिर लाल कपडा जमीन पर ही बिछा ले.
एक कलश स्थापित करे. कलश में गंगाजल लेकर कुछ चावल के दाने और कुछ पैसे(coin) डाल ले. अब  आम की धुली हुई पत्तियो को कलश के मुख पर सजाय फिर ऊपर से पानी वाला नारियल रखे.
ध्यान रहे नारियल का मुख हमेशा ऊपर की और ही होना चाहिए. आप चाहे तो नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर भी रख सकते हैं.
या फिर कलश के मुख पर भी लाल चुनरी बांध सकते हैं.
कलश मिटटी का या धातु का होना चाहिए. कलश पर साइड में सतिये का निशान बनाना भी शुभ माना जाता है.
माता दुर्गा के साथ बाकी देवी-देवताओ को भी मंदिर में स्थापित कर सकते हैं. फिर सब को गंगाजल से स्नान कराकर तिलक लगाया जाता है. फिर आप जो पूजा की सामग्री प्रयोग करना चाहते हैं वो कर सकते हैं.
फिर माता के सामने घी का दीपक, धूपबत्ती, अगरबत्ती जलाकर दुर्गा स्तुति और दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए. फिर सच्चे मन से माता का ध्यान करना चाहिए. फिर भोग लगाया जाता है.और माँ दुर्गा का प्रसाद बांटकर खुद भी ग्रहण किया जाता है.

यह नवरात्रो में माँ की पूजा करने का एक सरल तरीका है. इसके अलावा आप जैसे चाहे कर सकते हैं. देवी दुर्गा अपने सब बच्चो को प्यार करती है.
वैसे अधिकतर माता की पूजा में फल-फूल, चावल, कुमकुम, हल्दी, दूध, गंगाजल, पञ्च मेवे, हवन सामग्री, धूपबत्ती, अगरबत्ती, रुई की बत्ती, दीपक, घी, समिधाएं, बताशे, मिश्री, लौंग, प्रसाद भोग, पंचामृत आदि प्रयोग किया जाता है.

तीसरे दिन करें माँ चंद्रघंटा की पूजा

तीसरी शक्ति “माँ चंद्रघंटा” (Third form of Maa Chandraghanta):

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चंद्रघंटा

चंद्रघंटा माँ की पूजा नवरात्रो के तीसरे दिन की जाती है. माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के रूप का अर्ध चंद्र है. इसी कारण इनको चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है. माता का ये रूप सुखद शांति देने वाला और मनमोहक है. माता का शरीर सोने के समान चमकदार है. माँ के गले में सफेद सुंदर फूलों की माला होती है.
माँ के दस हाथ हैं जोकि सब किसी ना किसी अश्त्र-शस्त्र से सजे हुए हैं.
माता शेर पर सवारी करती है. माता का ये रूप युद्ध के लिए हमेशा तैयार दिखता है.
ऐसा माना जाता है कि माता के घंटे की तेज और भयभीत कर देने वाली ध्वनि से असुर, अत्याचारी राक्षस और दानव सभी डरते हैं.

अगर माँ भगवती की उपासना की जाती है तो आत्मिक शांति और अध्यात्मिक शक्ति मिलती है.

इनकी आराधना सदा फलदायी होती है.

माँ के भक्त इस दिन भक्ति एवम् श्रद्धा पूर्वक पूजा-अर्चना करते है. और माँ अपने बच्चो को सदा चिरायु और सुख-संपत्ति का वरदान देती है.

कहा जाता है कि इस दिन माँ  की उपासना करके महिलाओ को अपने घर पर बुलाकर भोजन कराया जाना चाहिए. और भेट स्वरूप उन्हे मंदिर की घंटी दी जाए तो माँ की कृपा सदा भक्तो पर बनी रहती है.

माँ चंद्रघंटा की पूजा का मंत्र (Mantra of MaaChandraghanta):
पिण्डज प्रवरारूढा चंडकोपास्त्र कैर्युता
प्रसाद तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता!!

भावार्थ:  अर्थात इनके माथे पर घंटे के आकर का अर्ध चंद्र है, इनके शरीर का रंग सोने के समान चमकीला है. इनके दसो हाथो में शस्त्र आदि है. ये सिंह पर सवारी करती है. इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने वाली है. इनके घंटे की भयभीत ध्वनि से दानव दैत्य सभी डरते है.

माँ चंद्रघंटा की आरती(Aarti of MaaChandraghanta):

“नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान!
मस्तक पर है अर्ध चन्द्र, मंद मंद मुस्कान!!
दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खड़ग संग बांद!
घंटे के शब्द से हरती दुष्ट के प्राण !!
सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके स्वर्ण शरीर!
करती विपदा शांति हरे भक्त की पीर!!
मधुर वाणी को बोल कर सब को देती ज्ञान !
जितने देवी देवता सभी करें सम्मान !!
अपने शांत सवभाव से सबका करती ध्यान!
भव सागर में फँसा हूँ मैं, करो मेरा कल्याण!!
नवरात्रों की माँ, कृपा कर दो माँ!
जय माँ चंद्रघंटा, जय माँ चंद्रघंटा!!”