लाल बहादुर शास्त्री का जीवन परिचय

लाल बहादुर शास्त्री!!!लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री दोस्तों शास्त्री जी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, उनका जीवन बहुत ही प्रेरणादायी रहा है हम सभी उनके जीवन से प्रेरणा ले सकते हैं.  दोस्तों सीधे और सरल स्वभाव के शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के बनारस से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था.
बापू के जीवन से जुड़ीं अनमोल बातें

शास्त्री जी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे. जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था.पति के मृत्यु के बाद शास्त्री जी की माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर रहने लगीं .मुगलसराय में लाल बहादुर शास्त्री की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी के बावजूद उनका बचपन खुशहाल बीता. जब शास्त्री जी थोड़े बड़े हुए तो उन्हें बनारस में अपने चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया . ताकि वे अच्छे विद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर सकें. घर पर सब शास्त्री जी को नन्हें के नाम से बुलाते थे.
शास्त्री जी कई मील का सफर नंगे पाँव तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें आग उगलती और गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था.

बड़े होने के साथ-ही लाल बहादुर शास्त्री विदेशी दासता से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे. वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से बहुत प्रभावित हुए. लाल बहादुर शास्त्री जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था.
शास्त्री जी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, और इस वक्त शास्त्री जी केवल सोलह वर्ष के थे. शास्त्री जी के मन में देश सेवा की भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था. उनके इस निर्णय ने उनकी मां को बहुत हताश किया. उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे. लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था. उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ थे .
लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित किये गए कई राष्ट्रीय संस्थानों में से एक वाराणसी के काशी विद्या पीठ में शामिल हुए. यहाँ वे महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आए. विद्यापीठ द्वारा उन्हें प्रदत्त स्नातक की डिग्री का नाम ‘शास्त्री’ था लेकिन लोगों के दिमाग में यह उनके नाम के एक भाग के रूप में बस गया.

शादी:
दोस्तों 1927 में उनकी शादी हो गई उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था. उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी. दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे. दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं.लाल बहादुर शास्त्रीशास्त्री जी ने 1930 में महात्मा गांधी के साथ नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की. शास्त्री जी ने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया और कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे. आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई उन्हें देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया. उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए. कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तर प्रदेश में एक लोकोक्ति बन गई. दोस्तों 1951 में नई दिल्ली आ गए एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे. उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी. शास्त्री जी ने एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की. उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी. अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी वे कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे एवं अपना योगदान दिया. 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था.

दोस्तों विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति वाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा. शास्त्री जी दूरदर्शी थे जो देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये. दोस्तों लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के राजनीतिक शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थे. अपने गुरु महात्मा गाँधी के ही लहजे में एक बार उन्होंने कहा था – “मेहनत प्रार्थना करने के समान है.” शास्त्री जी की प्रतिभा और निष्ठा को देखते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने 1964 में लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद का उत्तरदायित्व सौंपा. 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमन्त्री का पद भार ग्रहण किया.
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 26 जनवरी, 1965 को देश के जवानों और किसानों को अपने कर्म और निष्ठा के प्रति सुदृढ़ रहने और देश को खाद्य के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने के उद्देश्य से जय जवान, जय किसान‘ का नारा दिया. यह नारा आज भी भारतवर्ष में लोकप्रिय है.
उजबेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के पश्चात 11 जनवरी, 1966 की रात को रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई. सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त शास्त्री जी को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया.

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