जानिए क्यों मनाई जाती है बकरीद, क्या है कुर्बानी प्रथा

बकरीद एक मुस्लिम त्यौहार है जिसको मुस्लिम लोग उल्लास के साथ मानते हैं. इस बार बकरीद 2 सितम्बर को मनाई जाएगी

बकरीद

इस्लाम में बकरीद को बहुत पवित्र त्यौहार माना जाता है. इस्लाम में साल में दो ईद मनाई जाती है. एक जिसे मीठी ईद कहा जाता है और दूसरी बकरीद. ईद हमें समाज में प्रेम की मिठास घोलने का संदेश देती है. वहीं बकरीद हमें अपने कर्तव्य के लिए जागरूक रहना सिखाती है. ईद-उल-ज़ुहा या बकरीद कुर्बानी का दिन होता है. आमतौर पर मुस्लिम समाज में बकरे को पाला जाता है और उसकी देखभाल की जाती है. और जब वह बड़ा हो जाता हैं उसे बकरीद पर अल्लाह के लिए कुर्बान किया जाता है. जिसे फर्ज-ए-कुर्बान कहा जाता है.

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 जानिये क्यों मनाई जाती है बकरीद:

BAKRID

ईद-उल-अज़हा को सुन्नते इब्राहीम भी कहते है. इस्लाम के अनुसार, खुदा ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे अपनी सबसे प्रिय चीज कुर्बान करने को कहा. हजरत इब्राहिम को सबसे प्रिय उनका बेटा था इसलिए उन्होंने बेटे की बलि देना स्वीकार किया. हजरत इब्राहिम को डर था कि क़ुरबानी के वक्त भावनाएं उनपर हावी ना हो जाएं इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली, जब काम पूरा करने के बाद पट्टी हटाई तो उन्होंने अपने बेटे सामने जिन्‍दा खड़ा पाया. बेदी पर कटा हुआ भेंड़ जैसा जानवर पड़ा हुआ था, तब से इस मौके पर कुर्बानी देने की प्रथा है. बकरीद हमें कुर्बानी का पैगाम देती है. यह हमें सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना नहीं सिखाता है. धन दौलत, अहंकार और हर वह चीज़ जो हमें मोहमाया में जकड़े रहती है और हमें बुराई के रास्ते पर धकेलती है और बुरे काम करने के लिए बढ़ावा देती है उसका त्याग करना सिखाता है.

आपसी भाईचारे को बढ़ाता है कुर्बानी का हिस्सा:
भारत में बकरा, ऊंट, और भैंस की भी कुर्बानी दी जाती है. इस्लाम में गरीबों और जरूरतमंदों का खास ख्याल रखने की परंपरा है. इसी वजह से बकरीद पर गरीबों का विशेष ध्यान रखा जाता है. इस दिन कुर्बानी के बाद गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं. इन तीनों हिस्सों में से एक हिस्सा खुद के लिए और शेष दो हिस्से समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों का बांटा दिया जाता है.ऐसा कर मुस्लिम इस बात का पैगाम देते हैं कि हम अल्लाह कि बताई राह पर चलने को हमेशा तैयार हैं. नियम के अनुसार इस्लाम में बताया गया है कि पहले अपना कर्ज उतारें, फिर हज पर जाएं, तब बकरीद जाएं मनाएं इसका मतलब यह है कि इस्लाम व्यक्ति को अपने परिवार, अपने समाज के दायित्वों को पूरी तरह निभाने पर जोर देता है. दोस्तों आपको बता दें कि बकरीद या कहें बकरा-ईद का बकरों से कोई संबंध नहीं है. और ना ही यह उर्दू का शब्द है. असल में अरबी में ‘बक़र’ का अर्थ है बड़ा जानवर जो जि़बह किया (काटा) जाता है. इसी को भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश में इसे ‘बकरा ईद’ बोलते हैं.

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